अलवर : सावन मास में भोलानाथ के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. पवित्र माह होने के कारण इस मास में कुछ भक्त ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए भी यात्रा करते हैं, लेकिन अलवर के भक्तों को बाहर यात्रा करने की जरुरत नहीं, कारण है कि यहां 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन एक ही मंदिर में हो जाते हैं. चंद्रेश्वर महादेव मंदिर करीब 200 साल से भी पुराना है. मान्यता है कि इस मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना अलवर के पूर्व महाराजा विनयसिंह ने कराई. यह मंदिर पुराने शहर में रंग भरियों की गली में बना है. इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां स्थापित 12 शिवलिंग में से 5 शिवलिंग अर्धनारीश्वर शिवलिंग हैं. यह मंदिर देखने में छोटा प्रतीत होता है, लेकिन अलवर शहर में यह एकमात्र मंदिर है, जहां 12 शिवलिंग एक साथ विराजित हैं.
इस मंदिर की सार संभाल करने वाले सेवक दुर्गेश कुमार तिवारी ने बताया कि वे परिवार की 6ठी पीढ़ी के व्यक्ति हैं, जो इस मंदिर की देखभाल व सेवा कर रहे हैं. अलवर शहर की रंग भरियों की गली में चंद्रेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है. इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां पर 12 ज्योतिर्लिंग विराजित हैं. इनमें करीब 5 ज्योतिर्लिंग अर्धनारीश्वर रूप में विराजित हैं. यह शिवलिंग दो रंग में दिखाई देते हैं, जिन्हें दूर से ही पहचाना जा सकता है. साथ ही काले व लाल पत्थर से निर्मित गणेश प्रतिमा के साथ मार्बल से निर्मित हनुमान प्रतिमा भी यहां विराजित हैं. अभी तक सुनते आए हैं कि यह मंदिर बुजुर्गों के समय से स्थापित है. इस मंदिर की पूजा अर्चना उनके पूर्वज करते रहे, अब वे कर रहे.
2018 में कराया मंदिर का जीर्णोंद्धार : दुर्गेश कुमार तिवारी ने बताया कि यह मंदिर 200 साल से भी ज्यादा पुराना होने के कारण जर्जर अवस्था में पहुंच गया था. इस कारण 2018 में इस मंदिर का जीर्णोंद्धार उन्होंने अपने खर्च से करवाया. इसके बाद पूरे क्षेत्र के लोग यहां आकर पूजा अर्चना करते हैं. भगवान शिव की आराधना के लिए भक्त यहां समय-समय पर सत्संग का आयोजन करते हैं. मंदिर में फाग व महाशिवरात्रि धूम धाम से मनाई जाती है. हालांकि, मंदिर परिसर छोटा है, लेकिन भक्तों की शिवलिंग के प्रति आस्था भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के समान है.
मंदिर का इतिहास : इतिहासकार हरिशंकर गोयल ने बताया कि शहर के रंग भरियों की गली में स्थित प्राचीन शिव मंदिर अपने आप में खास है. इस मंदिर की धार्मिक मान्यता के साथ इतिहास भी अनोखा है. मंदिर में विराजित 12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना अलवर के तीसरे महाराजा विनय सिंह ने विद्वानों के कहने पर करवाई थी. कहा जाता है कि महाराजा विनय सिंह के कई वर्षों तक कोई संतान नहीं हुई, जिस पर उन्हें विद्वानों ने देश के विभिन्न स्थानों से ज्योतिर्लिंग अलवर में लाकर एक जगह पर स्थापित करने को कहा.
पूर्व महाराजा ने करवाई ज्योतिर्लिंग की स्थापना : खास बात यह है कि मंदिर में स्थापित सभी ज्योतिर्लिंग को पूर्व महाराजा विनयसिंह उन्हीं अलग-अलग भूमि से लेकर आए, जहां आज भी 12 ज्योतिर्लिंग विराजित हैं. सभी ज्योतिर्लिंग को एक साथ स्थापित करने के बाद पूर्व महाराजा विनय सिंह ने भगवान शिव के सभी ज्योतिर्लिंग का रुद्राभिषेक कराया. इतिहास में ऐसा भी पाया जाता है कि इसके बाद पूर्व महाराजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिनका नाम शिवदान सिंह रखा गया. ये आगे चलकर अलवर के शासक बने. मंदिर के जीर्णोंद्धार के समय मंदिर में स्थापित शिवलिंग को नहीं छेड़ा गया, यह शिवलिंग पहले के यथा स्थान पर ही विराजित है.
स्वामी विवेकानंद ने भी यहां किया रुद्राभिषेक : इतिहासकार गोयल के अनुसार यह मंदिर ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण स्थान है. इसी मंदिर के बारे में यह भी कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद के अलवर प्रवास के दौरान उन्होंने इस मंदिर में रुद्राभिषेक किया था. भक्त सावन में चंद्रेश्वर मंदिर में भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना करने आते हैं. भक्तों का कहना है कि देश के विभिन्न स्थानों पर भगवान भोलेनाथ की ज्योतिर्लिंग विराजित हैं, कई लोग ऐसे हैं जो ज्योतिर्लिंग की यात्रा किसी कारणवश नहीं कर पाते. अलवरवासी खुशनसीब हैं कि अलवर में उन्हें 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन व पूजा करने का अवसर एक ही स्थान पर मिलता है.




















