जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर, जिसे छोटीकाशी भी कहा जाता है, अपने प्राचीन मंदिरों और आध्यात्मिक धरोहरों के लिए जाना जाता है, लेकिन आमेर में स्थित अंबिकेश्वर महादेव मंदिर एक ऐसा शिवधाम है, जो न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि रहस्य और चमत्कार का जीवंत प्रतीक भी है. सावन महीने में जब भक्तों का शिव भक्ति में रंगा सैलाब उमड़ता है, तब इस मंदिर में एक अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है, शिवलिंग पूरी तरह जल में समा जाता है और मंदिर का गर्भगृह जलमग्न हो जाता है.
मंदिर की अनोखी बनावट और रहस्य: जयपुर के आमेर क्षेत्र के सागर रोड पर स्थित अंबिकेश्वर महादेव मंदिर का शिवलिंग धरती के नीचे स्थित है. श्रद्धालुओं को शिवलिंग के दर्शन के लिए सीढ़ियों से नीचे उतरना होता है, लेकिन खास बात ये है कि हर साल सावन के महीने में यहां भूगर्भ से जल निकलना शुरू हो जाता है, जो भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग तक पहुंचकर उनका स्वत: अभिषेक करता है. यह दृश्य न सिर्फ भक्तों को चमत्कारी लगता है, बल्कि इसे प्रकृति द्वारा किया गया शिव पूजन भी माना जाता है.
मंदिर के पुजारी संतोष कुमार व्यास के अनुसार, यह जल किसी अन्य स्रोत से नहीं आता, बल्कि धरती के गर्भ से स्वयं निकलता है. वे इसे मां गंगा का स्वरूप मानते हैं और कहते हैं कि इस दौरान भगवान शिव स्वयं जल समाधि में चले जाते हैं. पिछले साल सावन में यह प्रक्रिया 51 दिनों तक चली थी, और इस साल भी जलमग्न शिवलिंग का दृश्य श्रद्धालुओं को देखने को मिला.
पुराणों में उल्लेख और मंदिर की दिव्यता: अंबिकेश्वर महादेव मंदिर का उल्लेख श्रीमद्भागवत के 11वें अध्याय के 64वें स्कंध में भी मिलता है. इसके अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण अपने ग्वालों के साथ यहां आए थे. उन्होंने यहां अपने केश त्यागे थे और अपने चरण चिह्न इस स्थल पर छोड़े थे. शिव पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है, जिसमें कहा गया है कि करीब साढ़े सात हजार वर्ष पूर्व राजा अमरीश ने अंबिका वन में तपस्या की थी. उसी स्थान पर आज अंबिकेश्वर मंदिर स्थित है. अंबिका वन से ही ‘अंबिकेश्वर’ और फिर ‘आम्बेर’ नाम पड़ा. हालांकि, मुगलों ने इसका नाम मोमीनाबाद रखने की कोशिश की थी, लेकिन तत्कालीन राजा के तर्क के आगे उन्हें झुकना पड़ा और नाम ‘आम्बेर’ ही रहा, जो ‘अंबर’ यानी आकाश से जुड़ा है.
3000 वर्ष पुराना नंदी और मंदिर की दिव्य मूर्तियां: मंदिर में विराजमान नंदी महाराज की मूर्ति भी भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है. बताया जाता है कि यह मूर्ति करीब 3000 वर्ष पुरानी है. श्रद्धालु जब नंदी के दर्शन करते हैं, तो उनकी आंखें श्रद्धा से भर उठती हैं. मंदिर परिसर में मौजूद अन्य मूर्तियां भी दिव्य और चमत्कारी मानी जाती हैं. भक्तों का कहना है कि सावन के महीने में यहां का हर पत्थर शिवमय हो जाता है, हर जलकण गंगामय लगता है और यहां का हर दर्शन आत्मा को शांति और तृप्ति देता है.




















