भरतपुर: पर्यावरण संतुलन के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले गिद्धों के संरक्षण की दिशा में भरतपुर में एक अनूठी पहल की शुरुआत हुई है. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान और बयाना की पहाड़ियों को गिद्धों के सुरक्षित आशियाने के रूप में विकसित करने के लिए वन विभाग और वर्ल्ड वाइड फंड (WWF) ने संयुक्त रूप से पांच वर्षों का विशेष संरक्षण अभियान शुरू किया है. यह अभियान न केवल गिद्धों की घटती संख्या को बचाने का प्रयास है, बल्कि पर्यावरण, स्वास्थ्य और जैव विविधता को संतुलित रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम भी है.
गिद्ध, प्रकृति का नायक: डीएफओ मानस सिंह ने बताया कि गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी कहा जाता है. ये मृत पशुओं के शवों को चट कर सड़न, संक्रमण और बीमारी फैलने से रोकते हैं. यदि गिद्धों की संख्या घटती रही तो खुले में पड़े पशु शव संक्रामक रोगों का कारण बन सकते हैं. यही वजह है कि गिद्धों का संरक्षण सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा से जुड़ा हुआ है.
गिद्धों के लिए आदर्श स्थान: भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान विश्वभर में पक्षी प्रेमियों के लिए प्रसिद्ध है. वहीं बयाना की पहाड़ियां गिद्धों के लिए प्राकृतिक नेस्टिंग साइट प्रदान करती हैं. मानस सिंह ने बताया कि यहां हिमालयन गिद्ध, इंडियन गिद्ध और इजिप्शियन गिद्ध की तीन प्रमुख प्रजातियां नियमित रूप से देखी जाती हैं. पहाड़ियों की ऊंचाई, शांत वातावरण, पशुपालन की परंपरा और खुले मैदान गिद्धों के लिए भोजन और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराते हैं. यही कारण है कि बयाना क्षेत्र को संरक्षण अभियान का मुख्य केंद्र बनाया गया है.
पहले चरण में वैज्ञानिक सर्वेक्षण: संरक्षण अभियान के पहले चरण में वन विभाग और WWF की टीमें बयाना क्षेत्र में गिद्धों की नेस्टिंग साइट्स, उड़ान क्षेत्र और उनकी संख्या का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करेंगी. इन आंकड़ों के आधार पर संरक्षण की रणनीति तय होगी. मॉनिटरिंग की प्रक्रिया को मजबूत बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा ताकि गिद्धों की गतिविधियों और आवास की स्थिति पर निरंतर नजर रखी जा सके.
मॉनिटरिंग सेंटर बनेगा ज्ञान का केंद्र: इस अभियान के तहत केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में एक आधुनिक मॉनिटरिंग सेंटर स्थापित किया जाएगा. यहां प्रशिक्षित कर्मी गिद्धों के स्वास्थ्य, गतिविधियों और आवास की लगातार निगरानी करेंगे. यह केंद्र भविष्य में गिद्ध संरक्षण से जुड़ी जानकारी साझा करने का मुख्य आधार बनेगा. इसकी मदद से न केवल भरतपुर बल्कि पूरे प्रदेश में संरक्षण से जुड़े प्रयासों को गति मिलेगी.
जनभागीदारी से बनेगा अभियान मजबूत: मानस सिंह ने बताया कि किसी भी संरक्षण अभियान की सफलता तब ही संभव है जब स्थानीय लोग इसे अपनाएं. इसी उद्देश्य से अभियान का दूसरा चरण ग्रामीणों, पशुपालकों और युवाओं को जागरूक करने पर केंद्रित होगा. स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम, ग्राम सभाओं में कार्यशालाएं, जन-जागरूकता शिविर और पोस्टर अभियानों के जरिए लोगों को गिद्धों के महत्व के बारे में बताया जाएगा. साथ ही यह भी समझाया जाएगा कि वे किस तरह गिद्धों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से बच सकते हैं.
गिद्धों की घटती संख्या की वजहें: गिद्धों की घटती संख्या के पीछे कई कारण हैं. मवेशियों को दी जाने वाली दर्द निवारक दवाएं उनके लिए घातक साबित हुईं, क्योंकि शव का मांस खाने से गिद्धों की मौत हो रही थी. शहरीकरण, खनन और पेड़ों की कटाई से उनकी नेस्टिंग साइट्स कम हो गईं. साथ ही, खुले में शव छोड़ने की परंपरा घटने से भोजन की कमी हो गई. उड़ान के दौरान बिजली के तारों और पंखों से टकराकर भी गिद्धों की मृत्यु बढ़ी. इन सभी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अभियान में विशेष रणनीतियाँ अपनाई जाएंगी.
संरक्षण के बाद स्थायी योजना: मानस सिंह ने बताया कि यह परियोजना पांच वर्षों तक चलेगी. इसके बाद इसे पूरी तरह से वन विभाग संभालेगा ताकि संरक्षण कार्य निरंतर चलता रहे. इस अभियान से न केवल भरतपुर बल्कि आसपास के जिलों में भी गिद्धों की संख्या बढ़ाने और पर्यावरण संतुलन को मजबूत करने के प्रयास किए जाएंगे. भरतपुर में शुरू हुआ यह अभियान गिद्धों की सुरक्षा के साथ-साथ जैव विविधता को संरक्षित करने की दिशा में एक प्रेरक प्रयास है. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान और बयाना की पहाड़ियां अब गिद्धों का सुरक्षित घर बनेंगी.




















