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अजमेर में 1928 से इको-फ्रेंडली मूर्तियों की परंपरा, बंगाल के कलाकार बना रहे मिट्टी के गणपति

अजमेर: गणेश चतुर्थी और नवरात्रि जैसे पर्वों पर जहां देशभर में भव्य मूर्तियां स्थापित होती हैं. अजमेर में बंगाली समाज 1928 से पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इको फ्रेंडली प्रतिमा निर्माण की मिसाल पेश करता आ रहा है. यहां हर साल बंगाल से आए मूर्तिकार अपने हाथों से मिट्टी की दुर्गा माता और गणेश प्रतिमाएं बनाते हैं. यह सिलसिला आज भी बरकरार है, बल्कि अब बंगाल से आने वाले कलाकार गणपति बप्पा की मूर्ति भी ईको फ्रेंडली बना रहे हैं.

राजस्थान में भी गणपति महोत्सव की धूम रहती है. गणपति महोत्सव में खुशी और श्रद्धा का माहौल रहता है. लेकिन मूर्तियों के विसर्जन के बाद जल प्रदूषण बढ़ बढ़ जाता है इसका सबसे बड़ा कारण गणपति बप्पा की मूर्ति का पीओपी से निर्मित होना है. पीओपी पानी में नही गलता और पीओपी की मूर्ति पर लगा केमिकल युक्त रंग जल को दूषित कर देता है. यही वजह है कि अब जागरूक लोग पीओपी से निर्मित गणपति को नहीं बल्कि मिट्टी से बनी गणपति की प्रतिमा को लाना ज्यादा पसंद करते हैं.

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मिट्टी, बांस, जूट की रस्सी, चावल की पराली, प्राकृतिक रंग और सूती कपड़ों से बनी ये मूर्तियां पूरी तरह से POP (प्लास्टर ऑफ पेरिस) मुक्त होती हैं, जिससे जल प्रदूषण नहीं होता. अब स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यावरण प्रेमी संस्थाएं भी इन मूर्तियों की मांग करने लगी हैं. अजमेर में गणपति महोत्सव की तैयारी शुरू हो गई है. स्थानीय ही नहीं बल्कि बंगाल से आए कलाकार भी सांचो में ढली नहीं बल्कि अपने हाथों से गढ़ी मिट्टी की गणपति प्रतिमा तैयार कर रहे हैं.

अजमेर में बंगाली समाज सन 1928 से दुर्गा अष्टमी का पर्व मानता आया है. नवरात्र में दुर्गा माता की प्रतिमा स्थापित की जाती है इसके लिए विशेष कर एक माह पहले बंगाल से कलाकार आते हैं और अपने हाथों से मिट्टी की दुर्गा माता की प्रतिमा को बनाते हैं. बंगाल के कलाकारों की कलाकारी के कायल स्थानीय लोग भी हो चुके हैं. यही वजह है कि नगर निगम ही नहीं बल्कि अजमेर में प्रमुख स्थान पर दुर्गा माता की प्रतिमा बंगाल से आए कलाकारों से ही बनवाई जाती है जो पूरी तरह से इको फ्रेंडली होती है.

कलकत्ता से आए मूर्तिकार तरुण कुंडु बताते हैं कि एक प्रतिमा बनाने में काम से कम 15 दिन का समय लगता है. उन्होंने बताया कि छोटे आकार की गणपति की प्रतिमा वह दो फीट तक बनाते हैं. इससे कम आकार की प्रतिमा में वक्त और मेहनत ज्यादा लगती है लेकिन दाम नहीं मिल पाता. कलाकार तरुण कुंडू बताते हैं कि बड़ी प्रतिमाओं की भी काफी डिमांड है. उन्होंने बताया कि 8 हजार से लेकर 25 हजार रुपए तक की मूर्तियां वह बनाते है. उन्होंने बताया कि इको फ्रेंडली गणपति की डिमांड देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हो रही है.

बंगाली धर्मशाला समिति के अध्यक्ष देवाशीष विश्वास बताते हैं कि बंगाली कलाकारों की बनाई गई प्रतिमाओं में विशेष आकर्षण रहता है. यह कला और संस्कृति का समायोजन होती है. जिसमें अपनी माटी की सुगंध होती है जो हमें अपनी परंपराओं और प्रकृति से जोड़े रखती है. उन्होंने बताया कि बड़ी ही खूबसूरती से और मेहनत से कलाकार प्रतिमा को आकार देते हैं. मिट्टी की प्रतिमा में इको फ्रेंडली कलर ही उपयोग होते हैं.

इको फ्रेंडली प्रतिमा ही लाए घर : अजमेर में कई पर्यावरण प्रेमी संस्थाएं भी स्थान या मूर्तिकारों से मिट्टी के गणेश की छोटी प्रतिमाएं तैयार करवा रही है. सभी का मकसद है कि पीओपी और घातक रसायन से बनी प्रतिमाओं को छोड़कर अपनी मिट्टी से जुड़े और मिट्टी की ही प्रतिमा बनाकर भगवान श्री गणेश की पूजा करें. सही मायने में यही सच्ची श्रद्धा है जिसमें किसी का नुकसान नहीं है.

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