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इस अनोखी दुकान में चीलों के लिए बनते हैं गुलगुले, रोज 30-35 किलो बिकते हैं

बीकानेर : सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को समेटा बीकानेर अपनी एक अलग पहचान रखता है. आज हम बात करेंगे बीकानेर में ऐसी दुकान की जिसका उद्देश्य कुछ अलग है. इस दुकान की खासियत है गुलगुला. ये खाने में मीठी होती है, जो आटे और गुड़ से बनती है और सरसों के तेल में इसे तला जाता है. इसे स्थानीय भाषा में गुलगुला कहते हैं. जिस तरह दाल या मिर्च का पकौड़ा होता है, उसी तरह आटे और गुड़ से बने इस पकौड़े को गुलगुला कहते हैं. ये गुलगुला खासतौर पर चीलों के लिए बनाया जाता है.

शताब्दी पुरानी दुकान : बीकानेर में स्थित ये दुकान पिछले 100 साल से भी ज्यादा समय से चल रही है. तीन पीढ़ी इस काम को कर रही है और अब चौथी पीढ़ी भी इस काम में आने के लिए तैयार है. तीसरी पीढ़ी में इस काम को कर रहे बुलाकी राम मोदी कहते हैं कि उनके दादाजी ने 100 साल से ज्यादा पहले इस काम को शुरू किया था. उनके पिताजी की उम्र 75 वर्ष है. उन्होंने भी पूरी जिंदगी इस काम को किया. अब वो भी इस काम को कर रहे हैं.

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चील का भोजन : उन्होंने बताया कि ये गुलगुला किसी व्यक्ति के लिए नहीं बनते, बल्कि आसमान में उड़ रही चील को खिलाए जाते हैं. इसकी शुरुआत बुलाकी राम के दादा ने उस वक्त की थी जब बड़ी संख्या में इस क्षेत्र में चीलों का आना हुआ करता था. बुलाकी कहते हैं ये काम कैसे शुरू हुआ ये पता नहीं, लेकिन दादाजी ने उस वक्त चीलों को गुलगुला देना शुरू किया और बाद में ये सेवा और रोजगार का जरिया बन गया.

हर दिन आती चील : बुलाकी राम कहते हैं कि हर दिन अनवरत रूप से कार्यक्रम जारी है. हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा अनुसार आस्था के रूप में चील के भोजन के लिए पैसा देकर जाता है. इसी से हम गुलगुला बनाते हैं और चीलों को खिलाते हैं. वे कहते हैं कि कई लोग श्वान और गायों के लिए भी यह गुलगुला लेकर जाते हैं. दिनभर के बाद जो गुलगुला बचता है उसको श्वान और गायों को रात्रि में खिलाते हैं. हर दिन ताजा गुलगुला बनाते हैं. उन्होंने बताया कि हर दिन सुबह से लेकर शाम तक कई बार चील झुंड के रूप में इस क्षेत्र में आसमान में विचरण करती हैं. इस दौरान आसमान में इन गुलगुलों को बुलाकी राम उछालते हैं और तभी चील इन्हें लपकती हैं. बुलाकी राम बताते हैं कि गुलगुले 140 रुपए किलो बेचते हैं. हर दिन 30-35 किलो की बिक्री होती है.

लोगों की मान्यता कष्ट होते दूर : कहते हैं आस्था में शक्ति होती है. लोग यहां आस्था के रूप में नकद राशि चील के भोजन के लिए भेंट करके जाते हैं. साथ ही गाय और श्वान के लिए भी लेकर जाते हैं. बुलाकी राम कहते हैं कि लोगों का मानना है कि उनकी दुःख तकलीफ, बीमारी और अटका हुआ काम इससे दूर होता है. चील को भोजन कराने के लिए आए दीपक शर्मा कहते हैं कि सनातन धर्म में सेवा परमो धर्म को महत्व दिया गया है.

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