जोधपुर : सामान्यतः कौओं को भोजन करवाने की परंपरा श्राद्ध के दिनों में रही है, लेकिन जोधपुर में एक जगह ऐसी है, जहां साल के 12 महीने कौओं को भोजन करवाया जाता है. इसमें नमकीन, पनीर, दूध-रोटी, पकौड़ी शामिल होती है. यह काम पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय से रेलवे से रिटायर्ड प्रवीण पंवार कर रहे हैं. उनको कहना है कि इसके लिए वे ओर उनकी पत्नी दुर्गा पंवार सुबह जल्दी उठते हैं. इनके भोजन की तैयारी करते हैं. सुबह करीब 6 बजे भोजन देना शुरू करते हैं. पंवार दंपती को देख इस दौरान आस पड़ोस के लोग भी अपने साथ कुछ न कुछ लेकर आते हैं. इसके बाद दंपती अपने घर की दीवार पर खाने की चीजें कौओं के लिए डालते हैं.
श्राद्ध पक्ष से शुरू हुआ सिलसिला : 70 वर्षीय प्रवीण पंवार बताते हैं कि 15 साल पहले वे मसूरिया से शोभावतों की ढाणी स्थित मरुधर केसरी नगर अपने नए घर में आए थे. श्राद्ध के दौरान पितरों के प्रति श्रद्धा में घर के बाहर छत पर खाना रखा तो शुरू में आठ-दस कौवे आए. बाद में धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ने लगी. तब कौओं की भूख को देखकर प्रवीण पंवार ने इस क्रम को नियमित करने का ठान लिया. वे बताते हैं कि महंगाई बढ़ने के बाद भी कुछ दुकानदार कौओं के लिए उन्हें पुरानी दर पर बेसन की गांठिया दे रहे हैं.
60 से 70 रोटियां हर दिन बनाते हैं : पंवार की पत्नी हर दिन सुबह 4 बजे उठकर कौओं के लिए 60 से 70 रोटियां बनाती हैं, जिन्हें फिर दूध में भिगोते हैं. यह क्रम 15 साल से चल रहा है. छह बजे घर के सामने खाली प्लॉट पर रोटी डालते हैं. इस दौरान अन्य लोग अपनी ओर भी से खाने की चीजें डालने आते हैं. पंवार बताते हैं कि कौवे के दांत नहीं होते हैं, इसलिए मुलायम चीज ही देते हैं जो वो खा सकें.
पूरे दिन नमकीन गांठिया का दौर चलता है : प्रवीण पंवार के घर के बाहर रोजाना सुबह 6 बजे कौओं को भोजन देने का सिलसिला शुरू होता है. कौवे भी सुबह 5 बजे के आसपास बिजली तार और घरों की छतों पर आकर बैठ जाते हैं. इसी तरह से शाम को साढ़े पांच से 6 बजे के बीच इनको दोबारा भोजन दिया जाता है. वहीं, दिनभर इनका खाने के लिए आना-जाना लगा रहता है. इस दौरान आसपास के लोग भी यहां गांठिया डालने आते रहते हैं. इसके लिए घर की दीवार पर जगह तय कर दी है. वे बताते हैं कि एक दिन में तीन किलो तक नमकीन गांठिया चट कर जाते हैं. उन्हें महंगाई के दौर में भी सस्ते दामों पर मिल रहे हैं.
कौओं को क्यों दिया जाता है भोजन? : मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में कौवे को भोजन कराने से अपने पितरों तक भोजन पहुंचता है. इसके पीछे की किंवदंती है कि एक बार कौवे ने माता सीता के पैरों में चोंच मार दी थी. इसे देखकर प्रभु श्रीराम ने अपने बाण से उसकी आंखों पर वार किया, जिससे उसकी आंख फूट गई. कौवे को जब इसका पछतावा हुआ तो उसने श्रीराम से क्षमा मांगी. तब भगवान श्रीराम ने आशीर्वाद स्वरूप कहा कि तुमको खिलाया गया भोजन पितरों को तृप्त करेगा. भगवान श्रीराम के पास जो कौआ के रूप धरकर आए थे, वे देवराज इंद्र के पुत्र जयंती थे. तभी से कौवे को भोजन खिलाने का विशेष महत्व माना जाता है.




















