कोटा: राजस्थान के कोटा में इस बार आयोजित होने वाला राष्ट्रीय दशहरा मेला एक नया इतिहास रचने जा रहा है. मेले में 215 फीट ऊंचा रावण खड़ा किया जाएगा, जो विश्व रिकॉर्ड बनेगा. इस विशाल रावण को बनाने वाले हैं हरियाणा के अंबाला जिले के बराड़ा गांव निवासी तेजेंद्र चौहान. वह अपनी टीम के साथ पिछले चार महीनों से कड़ी मेहनत कर इस रावण को आकार दे रहे हैं. दशहरे के दिन इसका दहन होगा. रावण जितना बड़ा है, उतनी ही प्रेरणादायक है इसे बनाने वाले तेजेंद्र चौहान की कहानी. तेजेंद्र का सफर उन लोगों के लिए उदाहरण है जो परिस्थितियों से हार मान लेते हैं.
देश में अधिकांश रावण निर्माण से जुड़े लोग पीढ़ियों से इस काम में लगे हैं और इसे पारंपरिक पेशा मानते हैं, लेकिन तेजेंद्र चौहान की कहानी बिल्कुल अलग है. न तो उन्होंने इस काम की कोई ट्रेनिंग ली, और न ही उनके परिवार में इस कार्य की कोई विरासत रही. साल 1986 तक उन्हें रावण बनाना आता भी नहीं था. उनकी पहचान एक बदमाश जैसे छवि वाले युवक के तौर पर थी, जिसने पढ़ाई से नफरत करते हुए अपने पिता की उम्मीदों के खिलाफ जाकर गलत रास्ता अपनाया था, लेकिन जीवन की राह बदलने का अवसर तभी आता है, जब व्यक्ति स्वयं बदलाव चाहता है. अपने पिता अमीसिंह चौहान की सलाह पर उन्होंने रामलीला का मंचन और रावण के पुतले का निर्माण शुरू किया. धीरे-धीरे यह उनका जीवन बन गया. आज उसी युवक के नाम विश्व का सबसे ऊंचा रावण बनाने का रिकॉर्ड है.
पढ़ाई से नफरत और बदमाशी का दौर: ईटीवी भारत से हुई विशेष बातचीत में तेजेंद्र चौहान ने बताया कि उनके पिता अमीसिंह चौहान सरकारी स्कूल में हेड मास्टर थे. वह अपने बच्चों की पढ़ाई पर सख्ती से ध्यान देते थे. तेजेंद्र चार भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. घर में अनुशासन कड़ा था और खेलने-कूदने पर भी रोक थी. इस वातावरण में तेजेंद्र का मन पढ़ाई से उचट गया. उन्होंने 1983 में जैसे-तैसे दसवीं पास कर ली, लेकिन इसके बाद पढ़ाई से इनकार कर दिया. किताबें फेंक दीं और लगातार तीन साल तक गलत रास्ते पर चलते रहे. उन्होंने बताया कि रोजाना झगड़े होते, पिता के पास शिकायतें आतीं थी. पड़ोसियों की नजर में उनकी छवि एक बदमाश जैसी हो गई. तेजेंद्र खुद भी इस बात को लेकर परेशान थे कि उनका भविष्य चौपट हो चुका है, लेकिन उन्हें यह अहसास तब हुआ जब उन्होंने समझा कि उनके कार्यों से परिवार और खुद का नाम खराब हो गया है.
सामाजिक और धार्मिक कार्यों से बदली जिन्दगी: तीन वर्षों की उथल-पुथल के बाद, तेजेंद्र ने अपने पिता के सामने गलती मानते हुए माफी मांगी. पहले तो किसी ने विश्वास नहीं किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. बार-बार प्रयास करते रहे. अंततः उनके पिता ने कहा कि अब तुम्हारे पास कोई रास्ता नहीं बचा, केवल सामाजिक और धार्मिक कार्य करके ही अपनी छवि सुधार सकते हो. इस सलाह ने उनका जीवन बदल दिया. उन्होंने रामलीला मंचन और रावण निर्माण का काम शुरू किया. उनके साथ शुरू में वही युवक जुड़े जिनकी छवि भी खराब थी. पहली बार 1986 में उन्होंने घर से कुछ पैसे लगाए और चंदा इकट्ठा किया. कुछ उधार लेकर रामलीला शुरू की. उनके रावण बनाने का सफर भी यहीं से शुरू हुआ.
तीस साल का संघर्ष और सब कुछ बिक जाना: तेजेंद्र चौहान ने बताया कि उन्होंने 1986 से 2017 तक लगातार अंबाला के बराड़ा गांव में रावण निर्माण किया. इस दौरान उन्हें आर्थिक मदद न के बराबर मिली. चंदा जुटाने में मुश्किलें आईं. कई बार अपनी फसल बेचनी पड़ी. धीरे-धीरे करके उनकी 12 एकड़ जमीन भी रावण निर्माण में बिक गई. परिवार चलाना कठिन होता गया. विवाह के बाद बच्चों की जिम्मेदारी भी आई. आर्थिक संकट गहराया तो उन्होंने 2017 में घोषणा कर दी कि अब आगे से वह यह काम नहीं करेंगे. आयोजन का खर्च इतना बढ़ गया था कि उनके पास साधन नहीं बचे थे.
नए अवसर और आगे बढ़ता सफर: तेजेंद्र ने बताया कि 2017 के बाद परिस्थितियां बदलीं. पंचकूला की एक संस्था ने उन्हें आमंत्रित कर काम सौंपा. वहां उन्हें आर्थिक सहयोग मिला. इसके बाद चंडीगढ़, देहरादून, और अन्य जगहों पर भी रावण बनाने का मौका मिला. 2019 में चंडीगढ़, 2021 में फिर से बराड़ा, 2022 और 2023 में कई स्थानों पर आयोजन हुए. 2024 में दिल्ली के द्वारिका सेक्टर 10 में उन्होंने 210 फीट ऊंचा रावण बनाया, जो उस समय तक का सबसे बड़ा था. आज उनकी टीम में 25 लोग हैं और वे इस क्षेत्र में पहचान बना चुके हैं.
कोविड-19 के बाद नई राह: कोविड-19 महामारी के दौरान उन्होंने 2020 में काम बंद कर दिया. इस दौरान उन्होंने फाइबर की मूर्ति बनाने का काम सीखा. सलाह मिलने पर उन्होंने भगवान गणपति, शिव और अन्य देवताओं की बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनाना शुरू किया. उन्होंने बताया कि 50 फीट तक की मूर्तियां बनती हैं और विभिन्न संस्थानों से उन्हें काम मिलने लगा. इसके अलावा वे महापुरुषों के चेहरों की भी फाइबर से प्रतिकृतियां बनाते हैं. इस नई राह ने उनकी आजीविका को स्थिर किया, अब वे केवल रावण निर्माण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए विविध कार्य कर रहे हैं.
परिवार और विरासत: तेजेंद्र चौहान का कहना है कि उनके परिवार में कोई भी इस पेशे को नहीं अपनाना चाहता. उनकी बेटी निम्मी शादी के बाद अमेरिका में बस गई है. बेटा दिलावर अंबाला में ही रहता है और लिफ्टिंग का व्यवसाय करता है. पत्नी मंजू भी अंबाला में ही रहती हैं. उन्होंने अपने परिवार के लिए कुछ नहीं छोड़ा, लेकिन अपने प्रयासों से एक पहचान बनाई. वे आज भी उसी संघर्ष की राह पर हैं, जो कभी उनके जीवन की मजबूरी थी.
अब तेजेंद्र चौहान की पहचान देशभर में है. कोटा में 215 फीट ऊंचे रावण का निर्माण उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि बनने जा रही है. यह उनके वर्षों के संघर्ष, समर्पण और मेहनत का परिणाम है. उन्होंने बिना किसी पारंपरिक प्रशिक्षण के, बिना आर्थिक सहारे के, अपनी मेहनत और लगन से समाज में सम्मान पाया. उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर इंसान खुद को बदलने का निर्णय ले ले, तो कठिन परिस्थितियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं.




















