जयपुर: जिले में इस बार गणेश चतुर्थी पर इको-फ्रेंडली गणेश जी की प्रतिमाओं की डिमांड काफी बढ़ गई है. त्योहार के साथ-साथ प्रकृति को बचाने के लिए गाय के गोबर से बनी प्रतिमाएं विशेष रूप से तैयार की जा रही हैं.
गणेश चतुर्थी पर भक्त बाजार से प्रतिमा खरीदकर घर लाते हैं और उनकी स्थापना करते हैं. वहीं, अनंत चतुर्दशी के मौके पर इन प्रतिमाओं का विसर्जन धूमधाम से किया जाता है. आमतौर पर बाजारों में बिकने वाली कई गणेश प्रतिमाएं प्लास्टर ऑफ पेरिस और अन्य कृत्रिम संसाधनों से तैयार की जाती हैं. ऐसे में इन प्रतिमाओं का विसर्जन पूरी तरह से नहीं हो पाता, जिससे जल स्रोतों के प्रदूषित होने की संभावना बढ़ जाती है.
रेनवाल में स्थित श्री गोपाल गौशाला में ‘लोकल फॉर वोकल’ को बढ़ावा देने और स्थानीय महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं को बड़ी संख्या में तैयार किया जा रहा है. यह प्रतिमाएं गाय के गोबर और मिट्टी जैसे प्राकृतिक कच्चे माल से बनाई जा रही हैं. खास बात यह है कि इन प्रतिमाओं की कीमत बाजार में मिलने वाली प्रतिमाओं से बहुत कम है. इनके विसर्जन से किसी भी तरह का प्रदूषण नहीं होता. हिंदू समाज की रीति-रिवाजों में गाय के गोबर या उससे बनी वस्तुओं को काफी पवित्र माना जाता है.
देश भर में पहुंच गणेश प्रतिमाएं: रेनवाल स्थित श्री गोपाल गौशाला के अध्यक्ष कैलाश शर्मा ने बताया कि पर्यावरण और गौ संरक्षण को लेकर गौशाला में लगातार नवाचार किए जा रहे हैं. इस बार बढ़ती मांग को देखते हुए, पिछले 2 महीने से स्थानीय कारीगर गणेश जी की प्रतिमाएं बना रहे हैं. इस बार 20 हजार से ज्यादा प्रतिमाएं बनाई जा रही हैं, जिन्हें देश भर में भेजा जा रहा है. लोगों द्वारा गोबर से बनी इको-फ्रेंडली प्रतिमाओं की मांग लगातार बढ़ रही है. ऐसे में, देश भर से मिल रहे ऑर्डर्स के अनुसार इन प्रतिमाओं को पैक करके पहुंचाया जा रहा है.
इको-फ्रेंडली हैं ये प्रतिमाएं: गौशाला से जुड़े मनोज कुमावत ने बताया कि इन प्रतिमाओं को तैयार करने के लिए कच्चे माल के रूप में प्राकृतिक वस्तुओं का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसमें मुख्य रूप से गोबर और मिट्टी का प्रयोग होता है. एक सामान्य प्रतिमा को रंग-रोगन करके तैयार किया जाता है. इन प्रतिमाओं की गौशाला के अलावा ऑनलाइन भी बिक्री हो रही है. केमिकल से निर्मित मूर्तियां पानी में पूरी तरह से घुलनशील नहीं होतीं, जिससे जल स्रोत प्रदूषित होते हैं और केमिकल फैलता है. वहीं, गौशाला में निर्मित ये प्रतिमाएं जल स्रोतों को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएंगी. इस तरह, इको-फ्रेंडली गणेश जी की मूर्तियां बनाकर गौ और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है.
2 महीने पहले से जुट जाते हैं कलाकार: गाय के गोबर से मूर्ति बनाने का प्रशिक्षण ले चुकी बिंदु कुमावत बताती हैं कि प्रतिमा निर्माण से पहले उसके कच्चे माल को ठीक से तैयार किया जाता है. इसमें गोबर को पहले साफ किया जाता है, फिर उसमें एक निश्चित मात्रा में मिट्टी और एक विशेष प्रकार का पाउडर मिलाया जाता है. मूर्ति बनाने का काम 2 महीने पहले से शुरू कर दिया जाता है. एक प्रतिमा को सूखने में करीब 6 से 7 दिन का समय लगता है, जिसके बाद उस पर रंग-रोगन किया जाता है. यह गणेश प्रतिमाएं पूरी तरह से इको-फ्रेंडली हैं. वह प्रतिदिन करीब 200 प्रतिमाएं तैयार कर लेती हैं. इस कार्य में कई अन्य महिलाएं और युवतियां भी शामिल हैं, जो मूर्तियों का निर्माण कर रही हैं. इससे महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी मिल रहा है.
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