साध्वी संगीतश्रीजी जी एवं डॉ साध्वी परमप्रभाजी के सान्निध्य में मालू भवन में तेरापंथ के अष्टम आचार्य कालूगणी का महाप्रयाण दिवस मनाया गया। साध्वी संगीतश्रीजी ने कहा कि मघवागणी, माणकगणी, डालगणी जैसे तीन-तीन आचार्यों का सानिध्य प्राप्त करने वाले आचार्य कालूगणी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उनका 27 वर्ष का शासन काल स्वर्णिम काल था। शिक्षा, सेवा, साधना एवं साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ। संस्कृत, सूक्ष्म लिपिकला, चित्रात्मक कला के साथ साथ नवीन विहार क्षेत्रों की खोज कर धर्म प्रचार किया। अंतरंग साधना में स्वयं को नियोजित कर संघीय व्यवस्था में सक्रिय सेवा दी।

आचार्य श्री कालुगणी का प्रभाव इतना तीव्र था कि विरोधी जन भी उनकी वाणी से अभिभूत हो जाते थे। उनकी प्रेरक वाणी से बड़े-बड़े कार्य सफल होते थे और समाज में धर्म की गहरी छाप पड़ती थी।
साध्वी श्री ने सभी श्रावक-श्राविकाओं से आह्वान किया कि हम भी अपने जीवन में आचार्य कालुगणी जी की शिक्षाओं को आत्मसात कर धर्ममार्ग पर अग्रसर हों।
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आचार्य कालुगणी जी ने धर्मसंघ को आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ जैसे रत्नों को उजागर कर एक ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया, जो जैन धर्म और समाज के लिए अमिट प्रेरणा स्रोत है।
इस अवसर पर श्री सुमित बरडिया ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।श्रीमती मंजू जी झाबक एवं सुमन जी पुगलिया ने अपने विचार रखकर श्रद्धा व्यक्त की।
साध्वी श्री के ओजस्वी प्रवचन से पूरा वातावरण धर्ममय हो उठा और सभी श्रोता गहरी भावनाओं से अभिभूत हो गए।




















