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Bhilwara : न्यायालय परिसर हेतु आवंटित भूमि निरस्त करने की मांग, 650 से अधिक अधिवक्ताओं ने किया आवंटन का विरोध

Bhilwara : न्यायालय परिसर हेतु आवंटित भूमि निरस्त करने की मांग, 650 से अधिक अधिवक्ताओं ने किया आवंटन का विरोध

Bhilwara : न्यायालय परिसर हेतु आवंटित भूमि निरस्त करने की मांग, 650 से अधिक अधिवक्ताओं ने किया आवंटन का विरोध

भीलवाड़ा जिला न्यायालय परिसर अधिवक्ता संघर्ष समिति का गठन, जिला एवं सत्र न्यायाधीश को सौंपा ज्ञापन

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न्यायालय परिसर को शहर से दूर निर्जन क्षेत्र में स्थापित करने का निर्णय अत्यंत असुविधाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण: सुरेश चंद्र श्रीमाली

भीलवाड़ा (पंकज पोरवाल)। भीलवाड़ा के प्रस्तावित नवीन न्यायालय परिसर हेतु किए गए भूमि आवंटन के विरोध में अधिवक्ताओं ने एकजुट होकर “भीलवाड़ा जिला न्यायालय परिसर अधिवक्ता संघर्ष समिति” का गठन किया।

समिति के बैनर तले अधिवक्ताओं ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश के माध्यम से रजिस्ट्रार जनरल, राजस्थान उच्च न्यायालय के नाम ज्ञापन सौंपकर आवंटित भूमि को निरस्त करने की मांग उठाई। संघर्ष समिति के संयोजक राकेश जैन ने बताया कि हाल ही में तस्वारिया ग्राम स्थित चारागाह भूमि में से लगभग 62 बीघा भूमि नवीन न्यायालय परिसर हेतु आवंटित की गई है, जो भीलवाड़ा शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर, दुर्गम एवं निर्जन क्षेत्र में स्थित है।

उन्होंने कहा कि 650 से अधिक अधिवक्ताओं ने इस आवंटन का विरोध करते हुए इसे न्याय व्यवस्था तथा न्याय प्राप्त करने आने वाले आमजन के हितों के प्रतिकूल बताया है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व को-चेयरमैन सुरेश चंद्र श्रीमाली ने कहा कि एक ओर सरकारें “सुगम न्याय व्यवस्था” की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर न्यायालय परिसर को शहर से दूर निर्जन क्षेत्र में स्थापित करने का निर्णय अधिवक्ताओं एवं वादकारियों के लिए अत्यंत असुविधाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जिला बार एसोसिएशन के सदस्यों को विश्वास में लिए बिना इस प्रकार भूमि आवंटन किया जाना उचित नहीं है।

समिति के वरिष्ठ अधिवक्ता भेरूलाल बाफना एवं पूर्व अध्यक्ष कृष्ण गोपाल शर्मा ने बताया कि आवंटित भूमि लगभग 3000 बीघा चारागाह क्षेत्र के मध्य स्थित है, जहां भविष्य में समुचित विकास की संभावना बेहद कम है। उन्होंने कहा कि चारागाह क्षेत्र में वर्षों तक कोई आबादी या व्यावसायिक गतिविधियां विकसित नहीं हो पाएंगी, जिससे न्यायालय परिसर लंबे समय तक निर्जन बना रहेगा। पूर्व अध्यक्ष विक्रम सिंह राठौड़ एवं ऋषि तिवारी ने महिला अधिवक्ताओं एवं वादकारियों की सुरक्षा को गंभीर विषय बताते हुए कहा कि शहर से इतनी दूर न्यायालय परिसर स्थापित करना व्यवहारिक दृष्टि से उचित नहीं है।

पूर्व अध्यक्ष मोहम्मद फरजन, सुरेश चंद्र पालीवाल एवं गोपाल सोनी ने कहा कि यदि सरकार स्वयं यह मान रही है कि न्यायालय भवन निर्माण में लगभग 10 वर्ष का समय लगेगा, तो वर्तमान में दिखाई दे रही समस्याओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भविष्य में गंभीर स्थिति उत्पन्न होने से पहले ही उक्त भूमि आवंटन को निरस्त किया जाना चाहिए। समिति की ओर से जारी अपील में सह संयोजक अंशुल बंसल और प्रदीप व्यास ने कहा गया कि “भीलवाड़ा जिला एवं सत्र न्यायालय केवल एक न्यायिक भवन नहीं, बल्कि भीलवाड़ा शहर की आत्मा, पहचान और आमजन के विश्वास का केंद्र है।

Bhilwara : न्यायालय परिसर हेतु आवंटित भूमि निरस्त करने की मांग, 650 से अधिक अधिवक्ताओं ने किया आवंटन का विरोध

प्रतिदिन हजारों नागरिक चाहे वे किसान हों, व्यापारी हों, महिलाएँ हों, विद्यार्थी हों अथवा ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले सामान्यजन अपनी दैनिक विधिक आवश्यकताओं जैसे शपथ पत्र, नोटेरी, स्टाम्प, प्रमाण पत्र, लेखापढ़ी एवं न्यायिक कार्यों हेतु इस न्यायालय परिसर में आते हैं। वर्तमान में जिला प्रशासन द्वारा इस ऐतिहासिक एवं जनसुविधा से जुड़े न्यायालय परिसर को शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर एक निर्जन एवं दुर्गम स्थान पर आवंटित किया गया है, जहाँ मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। वहाँ न पर्याप्त आबादी है, न चिकित्सालय, न विद्यालय, न सुगम परिवहन व्यवस्था और न ही निकट पुलिस सुरक्षा उपलब्ध है।

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ऐसी स्थिति में आम नागरिकों, महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों एवं ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोगों के लिए न्याय तक पहुँचना अत्यंत कठिन एवं महंगा हो जाएगा। न्याय व्यवस्था की मूल भावना ‘सुलभ एवं सस्ता न्याय’ है, किन्तु प्रस्तावित स्थान इस भावना के विपरीत है। अतः ‘भीलवाड़ा जिला न्यायालय परिसर बचाओ अधिवक्ता संघर्ष समिति’ समस्त सामाजिक संस्थाओं, व्यापार मंडलों, प्रबुद्धजनों एवं भीलवाड़ा की जनता से विनम्र आह्वान करती है कि इस जनहित एवं शहर के सम्मान से जुड़े आंदोलन में अपना समर्थन प्रदान करें, ताकि भीलवाड़ा जिला न्यायालय को शहर से विस्थापित होने से बचाया जा सके।” इस दौरान भगवती देवी शर्मा, दुर्गा चौधरी एवं रोशन सालवी सहित अनेक अधिवक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

ज्ञापन में रामनिवास गुप्ता, अजयपाल सनाढ्य, पुष्पा ऑर्डिया, राकेश सुराणा, भूपेंद्र सिंह कानावत, ओम सोनी, गोविंद बिश्नोई, फारूक मोहम्मद मंसूरी, प्रकाश ओझा, सीताराम सोनी, ललित सोनी, बाबूलाल आचार्य, दीपक श्रीमाली, अंशुल बंसल, दिनेश जोशी, युवराज चंदेल, नरेंद्र गुर्जर, दीपक पारीक, अनिल धाकड़, आरिफ काजी, प्रशांत पत्रिया, आवेश वावला, संजू बाफना, रतन चौधरी, परीक्षित शर्मा, पियूष शर्मा, कैलाश कंवर चारण, डिंपल कंवर, रिंकू तंवर, ममता स्वर्णकार, कृष्णा स्वर्णकार, सरिता शर्मा, ललिता मेघवंशी सहित सैकड़ों अधिवक्तागण उपस्थित रहे।

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