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जयपुर मे बुराई पर अच्छाई की विजयोत्सव (विजय दशमी) दिवस 

जयपुर (श्रेयांस बैद)

संवत् २०८२ अश्विन शुक्ल पक्ष दशमी गुरुवार 02 अक्टूबर 2025

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पं. अनन्त पाठक :- विजय दशमी बुराई पर अच्छाई की जीत का ही प्रतीक हैं. बुराई किसी भी रूप में हो सकती हैं जैसे दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह ,मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, झूंठ, चोरी आदि किसी भी आतंरिक बुराई को अपने अंदर से समाप्त करना भी एक आत्म विजय हैं और हमें प्रति वर्ष अपने में से इस तरह की बुराई को समाप्त कर विजय दशमी के दिन इसका उत्सव मनाना चाहिये, जिससे एक दिन हम अपनी सभी इन्द्रियों पर राज कर सके।

दशहरा या विजयादशमी का महत्व :-

यह बुरे आचरण पर अच्छे आचरण की विजय की ख़ुशी में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं.सामान्यतः दशहरा एक जीत के रूप में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं.

खुशी की मान्यता सबकी अलग-अलग होती हैं. जैसे किसानो के लिए यह नयी फसलों के घर आने की खुशी हैं.

पुराने समय में इस दिन शस्त्रों एवम हथियारों की पूजा की जाती थी, क्यूंकि वे इसे युद्ध में मिली जीत के खुशी के तौर पर देखते थे. लेकिन इन सबके पीछे एक ही कारण होता हैं बुराई पर अच्छाई की जीत. किसानो के लिए यह मेहनत की जीत के रूप में आई फसलो का जश्न एवम सैनिको के लिए युद्ध में दुश्मन पर जीत का जश्न हैं।

आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये।स कालो विजयो ज्ञेयः सर्वकार्यार्थसिद्धये॥

यह आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन मनाया जाता हैं. नवरात्री के नौ दिनों के बाद विजय पर्व के रूप में दशहरा या विजयादशमी के रूप में मनाया जाता हैं।

दशहरा पर्व की कहानी क्या है , क्यों मनाया जाता है?

दशहरा के दिन के पीछे कई कहानियाँ हैं :-

दशहरा अर्थात विजयादशमी:-

`दश’ का अर्थ है दस और हरा अर्थात हार गया या पराजित हुआ । आश्विन शुक्ल दशमीकी तिथिपर दशहरा मनाते हैं । दशहरेके पूर्वके नौ दिनोंमें अर्थात नवरात्रिकालमें दसों दिशाएं देवीमांकी शक्तिसे आवेशित होती हैं । दशमीकी तिथिपर ये दिशाएं देवीमांके नियंत्रणमें आ जाती हैं अर्थात् दिशाओं पर विजय प्राप्त होती है । इसी कारण इसे `दशहरा’ कहते हैं । दशमीके दिन विजयप्राप्ति होनेके कारण इस दिनको `विजयादशमी’ के नामसे भी जानते हैं । विजयादशमी साढेतीन मुहूर्तोंमेंसे एक है जो अपने में एक सिद्घ मुहूर्त है । इस दिन कोई भी कर्म शुभफलदायी होता है ।

दशहरेका इतिहास:-

भगवान श्रीरामके पूर्वज अयोध्याके राजा रघुने विश्वजीत यज्ञ किया । सर्व संपत्ति दान कर वे एक पर्णकुटीमें रहने लगे । वहां कौत्स नामका एक ब्राह्मणपुत्र आया । उसने राजा रघुको बताया कि, उसे अपने गुरुको गुरुदक्षिणा देनेके लिए १४ करोड स्वर्ण मुद्राओंकी आवश्यकता है । तब राजा रघु कुबेरपर आक्रमण करनेके लिए सिद्ध हो गए । कुबेर राजा रघुकी शरणमें आए और उन्होंने अश्मंतक अर्थात कोविदार अथवा कचनार एवं शमी के अर्थात जांटी अथवा खेजडा वृक्षोंपर स्वर्णमुद्राकी वर्षा की । उनमेंसे कौत्सने केवल १४ करोड स्वर्णमुद्राएं लीं । जो स्वर्णमुद्राएं कौत्सने नहीं लीं, वह सब राजा रघुने बांट दीं । तभीसे दशहरेके दिन एकदूसरेको सोनेके रूपमें ‘अश्मंतक’के पत्ते लोग देते हैं ।

त्रेतायुगमें प्रभु श्रीरामने दशहरेके दिन बलशाली रावणका वध कर सीता माता को बंधन से मुक्त किया था । प्रभु श्रीराम ने दशहरेके दिन ही रावण का वध किया था ।

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द्वापारयुगमें अज्ञातवास समाप्त होते ही, पांडवोंने शक्तिपूजन कर शमी वृक्षकी कोटर में रखे अपने शस्त्र पुन: हाथों में लिए एवं राजा विराटकी गायोंको चुराने वाली कौरव सेना पर आक्रमण कर विजयश्री प्राप्त की । वह दिन भी दशहरेका ही था ।

विजयादशमीका महत्त्व:-

विजयादशमीके दिन सरस्वतीतत्त्व प्रथम सगुण अवस्था प्राप्त कर, तदुपरांत सुप्तावस्थामें जाता है अर्थात अप्रकट अवस्था धारण करता है । इस कारण दशमीके दिन सरस्वतीका पूजन एवं विसर्जन करते हैं । इससे पूजकमें देवीके मूर्त स्वरूपके प्रति आकर्षण बढता है । विजयादशमी साढेतीन मुहूर्तोंमेंसे एक है । इस दिन कोई भी कार्य शुभफलदायी होता है ।

दशमीको `दशहरा’ अथवा `विजयादशमी’ के नामसे संबोधित करनेका शास्त्रीय आधार :-

सातवें पातालकी बलवान अनिष्ट शक्तियां निर्गुण स्तरकी होती हैं । उन्हें पराजित करनेके लिए ईश्वर निर्गुण स्तरकी शक्तिका उपयोग न कर आनंदका उपयोग करते हैं । इसीलिए भी यह दिन `दशहरा’ कहलाता है ।

दशहरेके दिन वातावरणमें शीतलता प्रतीत होती है । ब्रह्मांडमें निर्गुण स्तरकी विष्णुतत्त्वकी आनंदतरंगें कार्यरत होती हैं । आनंदका स्तर शक्तिके स्तरसे सूक्ष्मतर है । इसलिए सातवें पातालकी बलवान आसुरी शक्तियोंको युद्ध करनेके लिए उनकी निर्गुण स्तरकी काली शक्तिका उपयोग करना पडता है । इस प्रक्रियामें उनकी शक्तिका व्यय अधिक मात्रामें होता है । परिणामस्वरूप असुरोंका नाश कर, देवता विजयी होते हैं । यही कारण है कि, इस दिनको `विजयादशमी’ कहते हैं ।

इस दिन विष्णुतत्त्वका निर्गुण स्तरका कार्य अधिक मात्रामें होता है । इसलिए त्रेतायुगमें प्रभु श्रीरामजीने इसी दिन बलशाली रावणका नाश कर सीतामाताको अर्थात श्रीविष्णुजीकी शक्तिको असुरोंके बंधनसे मुक्त किया ।

दशहरेका त्यौहार मनानेकी पद्धति:-

इस दिन सीमोल्लंघन, शमीपूजन, अपराजितापूजन एवं शस्त्रपूजन, ये चार धार्मिक कृतियां की जाती हैं ।

अ. सीमोल्लंघन:-

परंपराके अनुसार ग्रामदेवता को पालकीमे बिठाकर अपराह्न काल अर्थात दिनके तीसरे प्रहरमें दोपहर ४ के उपरांत गांवकी सीमाके बाहर ईशान्य दिशाकी ओर जाते हैं । जहां शमी और अश्मंतकका वृक्ष होता है, वहां रुक जाते हैं ।

आ. शमीपूजन अथवा अश्मंतक वृक्षका पूजन:-

शमीवृक्ष यदि उपलब्ध हो, तो उसका और शमीवृक्ष यदि उपलब्ध न हो, तो अश्मंतक वृक्ष का पूजन करते हैं और शमी वृक्षसे प्रार्थना करते हैं ।

शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका ।

धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी ।।

करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया ।

तत्र निर्विघ्नकर्त्री त्वं भव श्रीरामपूजिते ।।

अर्थ : शमी पापोंका शमन करती है । शमीके कांटे तांबेके रंगके अर्थात लाल होते हैं । शमी रामकी स्तुति करती है तथा अर्जुनके बाणोंको भी धारण करती हैं । हे शमी, रामने आपकी पूजा की है । मैं यथाकाल विजययात्रापर निकलूंगा । आप मेरी यात्राको निर्विघ्न एवं सुखमय बनाइए ।

प्रार्थनाके उपरांत वृक्षका पूजन करते हैं । अश्मंतक वृक्ष हो, तो उसका पूजन करते समय प्रार्थना करते हैं ।

अश्मन्तक महावृक्ष महादोषनिवारण ।

इष्टानां दर्शनं देहि कुरु शत्रुविनाशनम् ।। 

अर्थात हे अश्मंतक महावृक्ष, आप महादोषोंका निवारण करते हैं । मुझे मेरे मित्रोंका दर्शन करवाइए और मेरे शत्रुका नाश कीजिए । मेरी शत्रुताका विनाश किजिए तथा मेरा और मेरे शुभचिंतकोंको कल्याण किजिए ।

इस प्रकार प्रार्थनाके उपरांत वृक्षके नीचे चावल, पूगीफल अर्थात सुपारी एवं स्वर्ण अथवा तांबेकी मुद्रा अथवा सिक्के रखते हैं । तदुपरांत वृक्षकी परिक्रमा करते हैं ।

इ. अपराजितादेवीका पूजन:-

अ. पूजास्थलपर अष्टदलकी आकृति बनाते हैं ।

इस अष्टदलका मध्यबिंदु `भूगर्भबिंदु’ अर्थात देवीके `अपराजिता’ रूपकी उत्पत्तिबिंदु का प्रतीक है, तथा अष्टदलके आठबिंदु, अष्टपाल देवताओंका प्रतीक है ।

आ. इस अष्टदलके मध्यबिंदुपर `अपराजिता’ देवीकी मूर्तिकी स्थापना कर उसका पूजन करते हैं ।

‘अपराजिता’ श्री दुर्गादेवीका मारक रूप है । पूजन करनेसे देवीका यह रूप पृथ्वीतत्त्वके आधारसे भूगर्भसे प्रकट होकर, पृथ्वीके जीवोंके लिए कार्य करता है । अष्टदलपर आरूढ हुआ यह त्रिशूलधारी रूप शिवके संयोगसे, दिक्पाल एवं ग्रामदेवताकी सहायतासे आसुरी शक्तियोंका नाश करता है ।

पूजनके उपरांत इस मंत्रका उच्चारण कर शत्रुनाश एवं सबके कल्याणके लिए प्रार्थना करते हैं ।

हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला ।

अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम ।।

अर्थ : गलेमें विचित्र हार एवं कमरपर जगमगाती स्वर्ण करधनी अर्थात मेखला धारण करनेवाली, भक्तोंके कल्याणके लिए सदैव तत्पर रहनेवाली, हे अपराजितादेवी ! मुझे विजयी कीजिए ।

कुछ स्थानोंपर अपराजितादेवीका पूजन सीमोल्लंघनके लिए जानेसे पूर्व भी करते हैं । शमीपत्र तेजका उत्तम संवर्धक है । इसलिए शमी वृक्षके निकट अपराजितादेवीका पूजन करनेसे शमीपत्रमें पूजनद्वारा प्रकट हुई शक्ति संजोई रहती है । शक्तितत्त्वसे शमीपत्रको घरमें रखनेसे इन तरंगोंका लाभ पूरे वर्ष प्राप्त करना जीवोंके लिए संभव होता है । कुछ स्थानोंपर नवरात्रीकालमें रामलिलाका आयोजन किया जाता है । जिसमें प्रभु रामजीके जीवनपर आधारीत लोकनाट्य प्रस्तुत किया जाता है । दशहरेकी दिन तथा लोकनाट्यके अंतमें रावण एवं कुंभकर्णकी पटाखोंसे बनी बडी बडी प्रतिमाओंका दहन किया जाता है ।

दशहरेके दिन एकदूसरेको अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देनेका कारण:-

विजयादशमीके दिन अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देवताको अर्पित करते हैं । आपसी प्रेमभाव निर्माण करनेके लिए अश्मंतकके पत्ते शुभचिंतकोंको सोनेके रूपमें देकर उनके कल्याणकी प्रार्थना करते हैं । तदुपरांत ज्येष्ठोंको नमस्कार कर उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं । अश्मंतकके पत्तोंमें ईश्वरीय तत्त्व आकृष्ट करनेकी क्षमता अधिक होती है । इन पत्तोंमें १० प्रतिशत रामतत्त्व एवं शिवतत्त्व भी विद्यमान होता है । ये पत्ते देनेसे पत्तोंद्वारा व्यक्तिको शिवकी शक्ति भी प्राप्त होती है । ये पत्ते व्यक्तिमें तेजतत्त्वकी सहायतासे क्षात्रवृत्तिका भी संवर्धन करते हैं ।

अपराजिता’ शक्तितत्त्वकी उत्पत्ति पृथ्वीके भूगर्भबिंदु से होती है अपराजिता देवीसे प्रार्थना कर देवीका आवाहन करनेपर भक्तकी प्रार्थनानुसार अष्टदलके मध्यमें स्थित भूगर्भबिंदुमें देवीतत्त्व कार्यरत होता है ।

उस समय उनके स्वागतके लिए अष्टपाल देवताओंका भी उस स्थानपर आगमन होता है । अपराजिताकी उत्पत्तिसे मारक तरंगें प्रक्षेपित होती हैं । अष्टपालों द्वारा अष्टदलकी आठबिंदुओंसे लालिमायुक्त प्रकाश-तरंगोंके माध्यमसे ये मारक तरंगें अष्टदिशाओंमें प्रक्षेपित होती हैं । सर्व आठों बिंदुओंसे शक्तिकी मारक तरंगोंका प्रक्षेपण होता है । ये तरंगें विशिष्ट कोनोंमें एकत्रित होकर, रज-तमात्मक शक्तिका नाश करती हैं । पृथ्वीपर सर्व जीव निर्विघ्न रूपसे जीवन जी सकें, इस हेतु वायुमंडलकी शुद्धि भी करती हैं । पूजनके उपरांत शमी अथवा अश्मंतक वृक्षोंके मूलके समीपकी कुछ मिट्टी एवं उन वृक्षोंके पत्ते घर लाते हैं ।

दशहरेके दिन शस्त्रपूजन करने का महत्व:-

दशहरा व्यक्तिमें क्षात्रभावका संवर्धन करता है । शस्त्रोंका पूजन क्षात्रतेज जागृत करनेके प्रतीकस्वरूप किया जाता है इस दिन शस्त्रपूजन कर देवताओंकी मारक शक्तिका आवाहन किया जाता है । पूजनमें रखे शस्त्रोंद्वारा वायुमंडलमें क्षात्रतेजका प्रक्षेपण होकर व्यक्तिका क्षात्रभाव जागृत होता है । इस दिन प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवनमें नित्य उपयोगमे लाई जानेवाली वस्तुओंका शस्त्रके रूपमें पूजन करता है ।

हमारे देश में धार्मिक मान्यताओं के पीछे बस एक ही भावना होती हैं, वो हैं प्रेम एवं सदाचार की भावना. यह पर्व हमें एकता की शक्ति याद दिलाते हैं जिन्हें हम समय की कमी के कारण भूलते ही जा रहे हैं, ऐसे में यह त्यौहार ही हमें अपनी नींव से बाँधकर कर रखते हैं.

दशहरे का बदलता रूप:-

आज के समय में त्यौहार अपनी वास्तविक्ता से अलग जाकर आधुनिक रूप ले रहे हैं, जिसने इसके महत्व को कहीं न कहीं कम कर दिया हैं|

जैसे-दशहरे पर एक दुसरे के घर जाने का रिवाज था, अब ये रिवाज मोबाइल कॉल एवम इंटरनेट मेसेज का रूप ले चुके हैं.

खाली हाथ नहीं जाते थे, इसलिए शमी पत्र ले जाते थे, लेकिन अब इसके बदले मिठाई एवम तौहफे ले जाने लगे हैं, जिसके कारण यह फिजूल खर्च के साथ प्रतिस्पर्धा का त्यौहार बन गया हैं.

रावण दहन के पीछे उस पौराणिक कथा को याद रखा जाता था, जिससे एक सन्देश सभी को मिले कि अहंकार सर्वनाश करता हैं, लेकिन अब तरह- तरह के फटाके फोड़े जाते हैं, जिनके कारण फिजूल खर्च बढ़ गया हैं. साथ ही प्रदुषण की समस्या बढ़ती जा रही हैं एवम दुर्घटनायें भी बढती जा रही हैं.

इस प्रकार आधुनिकरण के कारण त्यौहारों का रूप बदलता जा रहा हैं. और कहीं न कहीं आम नागरिक इन्हें धार्मिक आडम्बर का रूप मानकर इनसे दूर होते जा रहे हैं. इनका रूप मनुष्यों ने ही बिगाड़ा हैं. पुराणों के अनुसार इन सभी त्योहारों का रूप बहुत सादा था. उसमे दिखावा नहीं बल्कि ईश्वर के प्रति आस्था थी. आज ये अपनी नींव से इतने दूर होते जा रहे हैं कि मनुष्य के मन में कटुता भरते जा रहे हैं. मनुष्य इन्हें वक्त एवम पैसो की बर्बादी के रूप में देखने लगा हैं.

हम सभी को इस वास्तविक्ता को समझ कर सादगी के रूप में त्यौहारों को मनाना चाहिये. देश की आर्थिक व्यवस्थता को सुचारू रखने में भी त्यौहारों का विशेष योगदान होता हैं इसलिए हमें सभी त्यौहार मनाना चाहिये.

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