जयपुर: परंपरा और आधुनिकता के संगम में अब संस्कृत शिक्षा भी पीछे नहीं रहेगी. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने जहां दुनिया भर की भाषाओं के लिए नए रास्ते खोले हैं, संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा को भी नई ऊर्जा मिलेगी. कठिन मानी जाने वाली संस्कृत भाषा को अब तकनीक की मदद से सरल और व्यावहारिक बनाने पर मंथन किया जा रहा है और अगले 2 से 3 महीने में यह मूर्त रूप लेगा. इस पर जयपुर स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में मंथन शुरू किया गया है. इससे न केवल शिक्षण बल्कि शोध को भी बल मिलेगा.
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर के निदेशक प्रो. वाई.एस. रमेश ने बताया कि अब संस्कृत में भी एआई को इंट्रोड्यूस करने की योजना बनाई जा रही है. भारतीय ज्ञान प्रणाली में जितना भी शिक्षण, अध्ययन, अध्यापन और शोध है, इन सभी में चुनौतियों का समाधान ढूंढने के लिए एआई मददगार साबित हो सकता है. प्रयास किया जा रहा है कि शिक्षण में एआई को शामिल करें.
फिलहाल यह योजना अपने शुरुआती चरण में है, लेकिन आगे आने वाले दो-तीन महीनों में एक प्राइवेट कंपनी के द्वारा पहले फैकल्टी को प्रशिक्षण दिया जाएगा. उसके बाद छात्रों के लिए अलग वर्कशॉप कराई जाएगी. एआई भले ही अंग्रेजी भाषा में हो, लेकिन संस्कृत में भी किसी टूल का इस्तेमाल कर इसे लागू किया जा सकता है, इस पर काम किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि संस्कृत में एआई का प्रयोग सफल है या नहीं, उसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को देखते हुए एआई को कोर्स में शामिल किया जाएगा.
भारतीय ज्ञान परंपरा: हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. नंदकिशोर पांडे ने बताया कि संस्कृत के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा जुड़ी हुई है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान पद्धति को प्रत्येक प्रश्न पत्र में पढ़ाया जा रहा है. भारत की जो ज्ञान परंपरा और शोध है, उससे भारतीय विद्यार्थियों को परिचित कराना है, इसलिए गणित, इतिहास, पत्रकारिता, विज्ञान, प्रबंधन और वाणिज्य से लेकर अलग-अलग विषयों में नए सिरे से रामायण-महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता को लेकर पढ़ाई हो रही है. इसका व्यापक प्रयोग संपूर्ण भारत में चल रहा है, इसमें एआई टूल मददगार साबित होगा.
पांडुलिपियों का डिजिटल संरक्षण: जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में हजारों साल पुरानी संस्कृत पांडुलिपियों को डिजिटाइज किया जा रहा है. एआई आधारित ओसीआर (Optical Character Recognition) तकनीक हस्तलिखित ग्रंथों को डिजिटल फॉर्म में बदल रही है. इससे न केवल ग्रंथ सुरक्षित होंगे, बल्कि शोधकर्ताओं के लिए भी सुलभ होंगे.




















