जयपुर : राजधानी में जारी भारतीय युवा संसद कार्यक्रम के दौरान भारत के 24 अलग-अलग राज्यों के अलावा दुनिया के अलग-अलग देशों से भी प्रतिभागी शिरकत करने के लिए पहुंचे हैं. इस बार कार्यक्रम की थीम सुशासन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भागीदारी रखी गई है, जिसे लेकर प्रतिभागियों में उत्साह भी नजर आ रहा है. आगरा में केंद्रीय हिंदी संस्थान से सहायक आचार्य डॉ. पुरुषोत्तम पाटील अपने यहां हिंदी सीख रहे कुछ विदेशी छात्रों को लेकर चर्चा में शिरकत करने पहुंचे. डॉक्टर पाटील ने बताया कि शुरुआत में उनके साथ आए प्रतिभागियों को इस कार्यक्रम को लेकर जिज्ञासा और सवाल थे, लेकिन जैसे ही वे यहां पहुंचे और कार्यक्रम का रूप देखा तो उत्साहित नजर आए. इन प्रतिभागियों ने बताया कि उन्हें काफी कुछ सीखने को मिल रहा है.
लोकतंत्र पर खुलेआम बात पर हैरानी : नाइजीरिया से आई प्रतिभागी दिला इब्राहिम ने बताया कि लोकतंत्र के परंपरा पर इस तरह से खुलेआम चर्चा का अनुभव उन्हें अपने देश में नहीं मिला और यहां यह सब देखकर काफी सुखद महसूस हो रहा है. उन्होंने बताया कि कैसे लोकतंत्र के मुद्दों पर सभी खुलकर चर्चा करते हैं. इस बीच ईरान से आए एक अन्य प्रतिभागी अमीन ने बताया कि 1 साल पहले भारत आए थे और वह यहां हिंदी सीख रहे हैं. उन्हें भारत में मिली आजादी बेहद पसंद है. कहीं भी यहां के लोग घूम सकते हैं कुछ भी खा सकते हैं और पहन सकते हैं, उनका मानना है कि यहां के लोगों को मिली आजादी से देश की तरक्की ज्यादा हो रही है.
बड़ी सोच से बढ़ेगा देश : कैरीबियन आईलैंड के त्रिनिदाद देश से आए डॉक्टर अव्विनिश अनंत नाराइन बताते हैं कि वह यहां आयुर्वेद पंचकर्म में बीएससी करने के बाद पीएचडी कर रहे हैं. भारतीय युवा संसद के कार्यक्रम को लेकर उन्होंने बताया कि यह बेहद शानदार कार्यक्रम है, जहां लोगों को स्वयं के बारे में सोचने की जगह देश को प्रथम रखने की सीख दी जा रही है. वह हाल ही में उनके देश में प्रधानमंत्री मोदी के दौरे का जिक्र करते हुए बताते हैं कि वहां स्पीकर की कुर्सी को आजादी के बाद भारत की ओर से तोहफे के रूप में दिया गया था. ये इस बात को जाहिर करती है कि भारत और त्रिनिदाद के बीच डिप्लोमेटिक रिलेशंस का दौर काफी वक्त पुराना है. उन्होंने बताया कि यहां के लोगों की और इस कार्यक्रम में आए मेहमानों की जब बातों को उन्होंने सुना तो भविष्य में वह इन बातों पर अपने देश में भी अमल करना चाहेंगे. नारायणा बताते हैं कि बहुत लंबी सोच रखने वाली नागरिक ही अपने देश को तरक्की की राह पर लेकर जाते हैं.
भारतीय परंपराओं की मुरीद ईरानी महिला : ईरान की रहने वाली फातेमेह मोअज्जमीपैरो बताती है कि 9 साल पहले वह आयुर्वेद में एमबीए करने के लिए भारत आई थी. वह लगातार दूसरे साल भारतीय युवा संसद में आ रही हैं. उन्होंने कहा कि संसदीय परंपरा हमें इस बात की सीख देती है कि कैसे सामंजस्य के साथ एक दूसरे से परस्पर सीखा जाता है. वह खुद अपनी सीनियर डॉक्टर के साथ जो कुछ सिखाती है उन्हें अपने जूनियर्स के साथ बताती हैं और इसी तरह से काम चलता है. इसी तरह के विचार जब युवा संसद में साझा किए जाते हैं, तो वह वैश्विक दृष्टिकोण पैदा करते हैं. उन्होंने अपने अनुभव के जरिए बताया कि इस बार उन्हें यह जानने का मौका मिला है कि कैसे अपने आप को बेहतर बनाया जाए. साथ ही बातचीत के जरिए लोकतंत्र में संतुलन कायम किया जा सकता है. फातेमेह बताती हैं कि जब उन्होंने आयुर्वेद पढ़ना शुरू किया, तो उन्हें सनातन की समझ आई, जो सभी को एक बताता है. उन्होंने बताया कि यहां से उन्हें इस बात की सीख मिली कि एक धर्म या संस्कृति की जगह सभी को अपनाएंगे, तो बेहतर कल का निर्माण होगा.
श्रीलंका और गयाना से भी आए युवा : श्रीलंका से आए भंते दम विजय बताते हैं कि युवा संसद में उन्हें कई विचारों के लोग मिले, जिनसे उन्हें बातचीत में काफी कुछ सीखने को मिला. वे एक बौद्ध भिक्षु भी हैं. उन्होंने बताया कि इस युवा संसद में उन्हें कई वक्ताओं से सुनने को भी मिला. वक्ताओं ने इस बात को काफी अच्छे से समझाया है कि हमें आगे बढ़ाना तो चाहिए, तकनीकी मदद भी लेना चाहिए, लेकिन अपनेपन को नहीं भूलना चाहिए. विजय का मानना है कि इस कार्यक्रम में शिरकत कर रहे ज्यादातर लोग युवा है जेनजी हैं, उन्हें दिग्भ्रमित होने से बचने के लिए ऐसी संगोष्ठी में आना चाहिए. श्रीलंका और भारत के मध्य गहरा संबंध है यहां तक की महात्मा बौद्ध भी भारत में पैदा हुए थे. ऐसे में हिंदी भाषा सीखना उनके लिए बेहतर अनुभव है.
इस कार्यक्रम में शिरकत करने आए एक और युवा गयना के दूधनाथ ने भी अपना अनुभव साझा किया. उन्होंने बताया कि कैसे धर्म सनातन के प्रति भारत आकर उनका दृष्टिकोण बदला है और अब वे पंडिताई भी सीख रहे हैं. उन्होंने पश्चिम तक हिंदी के महत्व को भी समझाया. युवा सांसद जैसे कार्यक्रमों को बेहतर बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन जीवन को दिशा देने के क्षेत्र में बुनियाद खड़ी करते हैं. यह कार्यक्रम लोकतंत्र में आपको भागीदारी के बारे में सीखाता है. दूधनाथ कहते हैं कि प्रकृति का नियम है कि हम सभी एक दूसरे का स्थान लेंगे, जब वरिष्ठ चले जाएंगे तो युवा जो आज सीख रहे हैं, कल वे उनके रिक्त स्थान को भरेंगे. इस तरह की आयोजन एक अवसर की तरह होते हैं, जिसमें आकर वे खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं.




















