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अलवर में 50 साल से हो रहा दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन, दिखता है बंगाली संस्कृति का संगम

अलवर: जिले में नवरात्र का त्योहार हर साल धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन यहां बंगाली समाज द्वारा आयोजित दुर्गा पूजा का अलग ही आकर्षण है. पिछले 50 सालों से यह आयोजन निरंतर चलता आ रहा है और अब यह सिर्फ बंगाली समाज तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे शहर के लिए एक बड़े सांस्कृतिक पर्व के रूप में स्थापित हो गया है. नवरात्र में दुर्गा पूजा के लिए शहरभर से लोग एक साथ जुटते हैं, पूजा में शामिल होते हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं.

1973 से शुरू हुई परंपरा: अलवर में बंगाली समाज की दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1973 में हुई थी. उस समय यह छोटा आयोजन होता था, लेकिन धीरे-धीरे इसमें शहरवासियों की भागीदारी बढ़ती गई. अब हर साल नवरात्र में यह आयोजन बड़ी भव्यता के साथ होता है. इस बार यह पूजा 50वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है. बंगाली समाज के अध्यक्ष डॉ. सरकार ने बताया कि शुरुआत से लेकर अब तक यह परंपरा लगातार चल रही है और शहर में सभी वर्गों के लोग इसमें शामिल होकर भाईचारे और एकता का संदेश फैलाते हैं.

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बंगाल से आते हैं कारीगर: अलवर की दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी खासियत इसकी भव्य प्रतिमाएं हैं. पूजा में स्थापित की जाने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा सहित लक्ष्मी, गणेश, कार्तिकेय और सरस्वती की प्रतिमाएं 15 फीट और 12-12 फीट तक ऊंचाई में तैयार की जाती हैं. इन प्रतिमाओं को बनाने के लिए पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले से विशेषज्ञ कारीगर बुलाए जाते हैं. पिछले 50 वर्षों से वही कारीगर जयदीप इस काम को संभाल रहे हैं.

कारीगर अलवर की चिकनी मिट्टी का उपयोग करते हैं और साथ ही बंगाल से विशेष सामान, रंग, कपड़े और सजावट का सामान मंगवाकर प्रतिमाओं को भव्य रूप देते हैं. इस मिट्टी से प्रतिमाओं को मजबूती और सुंदर आकार मिलता है, जिससे ये देखने में बिल्कुल बंगाल की असली झलक पेश करती हैं. कारीगरों का कहना है कि पारंपरिक कला और शिल्प का उपयोग करने से प्रतिमाएं बहुत आकर्षक बनती हैं.

पूजा पंडालों में मेले जैसा माहौल: नवरात्र में अलवर के पुराने सूचना केंद्र में पांच दिवसीय कार्यक्रम आयोजित होता है. पूजा के साथ-साथ यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य-गीत, भजन, और समाज सेवा की गतिविधियां भी चलती हैं. बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई इसमें भाग लेता है. पूजा पंडालों में मेला जैसा माहौल रहता है. शहरभर के लोग न सिर्फ पूजा में शामिल होते हैं, बल्कि प्रसाद ग्रहण करते हैं और सामूहिक भोजन में भाग लेते हैं. बंगाली समाज दुर्गा पूजा समिति के सदस्य दिलीप चटर्जी बताते हैं कि यह आयोजन अब पूरे शहर के लिए खास बन गया है. यहां हर वर्ग और समुदाय के लोग शामिल होकर भक्ति, संगीत और कला का आनंद लेते हैं. यह पर्व समाज में भाईचारे और सांस्कृतिक सौहार्द का संदेश देता है.

धार्मिक के साथ सांस्कृतिक पहचान भी: अलवर में बंगाली समाज के अध्यक्ष डॉ. सरकार बताते हैं कि अलवर में दुर्गा पूजा अब सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह गया है. यह शहरवासियों के लिए सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक मेलजोल का भी माध्यम बन गया है. पूजा के दिनों में लोग एक साथ आते हैं, उत्सव का आनंद लेते हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों से जुड़ते हैं. यह आयोजन हर साल बढ़ती लोकप्रियता के साथ आगे बढ़ रहा है. शहर के लोगों में पूजा को लेकर उत्साह और आस्था दोनों बढ़ रही हैं. मां दुर्गा की प्रतिमाओं के दर्शन से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक, सब कुछ इस पर्व को एक अनूठा अनुभव बनाता है.

अलवर की मिट्टी और बंगाल की कला का मेल: अलवर की चिकनी मिट्टी और बंगाल से आए कारीगरों की पारंपरिक कला का मेल इस आयोजन की आत्मा है. प्रतिमाएं बनाने में जिस बारीकी का ध्यान रखा जाता है, वह देखने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित करती है. रंगों की सजावट, कपड़े की नक्काशी, और पूजा के सामान का उपयोग मिलकर इसे भव्य रूप देते हैं. यही कारण है कि अलवर की दुर्गा पूजा अब पूरे शहर में पहचान बना चुकी है.

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