गुनगुनाते हुए लग गया शौक : सुराणा बताते हैं कि उन्हें रेडियो का शौक था और जिस तरह से लोग पसंदीदा फिल्मी गीतों को गुनगुनाते हैं इस तरह आकाशवाणी के एंकर की तर्ज पर गीतों की फरमाइश करने वालों के नाम गुनगुनाना शुरू कर दिए और यहीं से उनका यह शौक उनकी कला बन गया. हालांकि वे कहते हैं कि मैंने इसको लेकर कोई घंटे प्रैक्टिस नहीं की लेकिन धीरे-धीरे गुनगुनाने का शौक लगा तो खुद को भी लगा कि मैंने कुछ ऐसा पा लिया जो कि सामान्य नहीं है और फिर धीरे-धीरे यह मेरी पहचान बन गया.
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बीकानेर के नरेंद्र सुराणा का अनोखा शौक: एक सांस में नाम गिनाने की स्पीड ने दिलाई खास पहचान
बीकानेर: सालों पहले रेडियो पर प्रसारित होने वाले फिल्मी गीतों की कार्यक्रम में जब एंकर गाने की फरमाइश करने वाले की नाम बोलते थे उसी फरमाइश की स्टाइल को सुनकर बीकानेर के एक व्यक्ति को ऐसा शौक लगा की वही शौक उसकी पहचान बन गया.
एक सांस में कई नाम : बीकानेर के नरेंद्र सुराणा एक ऐसी शख्स हैं जिनका शौक अब उनकी पहचान बन गया है और अब लोग उन्हें एंकर नरेंद्र सुराणा के नाम से संबोधित करते हैं. दरअसल नरेंद्र एक साथ में तेज स्पीड में कितने नाम एक साथ और लेते हैं जिसकी न तो कल्पना करना संभव है और ना ही कोई व्यक्ति उस तर्ज पर वह नाम बोल सकता है.
कंमेट्री का शौक : गानों की फरमाइश में नाम बोलने का शौक रखने वाली नरेंद्र को कमेंट्री करने का भी शौक है और रेडियो पर होने वाली कमेंट्री की तर्ज पर कमेंट्री करने की उनकी स्टाइल एकदम हटकर हैं. नरेंद्र कहते हैं कि जब वो 15 साल के थे तब उन्हें यह शौक लग गया और 1970 से लगातार आज भी रेडियो सुनते हैं और देश के अलग-अलग रेडियो स्टेशन पर फिल्मी गीतों की फरमाइश भेजते हैं.
कई लोगों ने किया ट्राई : नरेंद्र कहते हैं कि शुरू-शुरू में तो लोगों ने उनकी इस खासियत को महत्व नहीं दिया लेकिन जैसे-जैसे उनके नाम याद रखने की और बोलने की शैली में बदलाव आता गया लोग तारीफ करते गए और अब तो कई बार मोहल्ले में या बाजार में समूह में बैठे लोग उनसे फरमाइश करते हुए बोलने के लिए कहते हैं. नरेंद्र कहते हैं कि उन्होंने रेडियो को सुनते सुनते इस और ध्यान दिया और अब जब लोग उनकी शैली की प्रशंसा करते हैं तो अच्छा लगता है कि उनके पास भी कुछ विशेष योग्यता जैसी चीज है जो लोगों को आकर्षित करती है.
आज का रेडियो का अंदाज : नरेन्द्र सुराणा के मुताबिक वक्त के साथ-साथ रेडियो पर सुनी जाने वाली आवाज के अंदाज में भी बदलाव आये हैं. अब एफएम का दौर और आकाशवाणी दोनों की आवाज का अंदाज जुदा है. लेकिन फिर भी रेडियो की लाइफ स्टाइल उन्हें उसी कदर लुभाती है, जैसा आज के पांच दशक पहले हुआ करता था. लिहाजा सुराणा कहते हैं कि अब भी अपने इस शौक के लिए आज के रेडियो जॉकी के अंदाज को समझने की कोशिश करते हैं और फिर अभ्यास के जरिए इसे दोहराकर लोगों का मनोरंजन करना चाहते हैं. उनका कहना है कि जीवन खत्म होने के बाद शौक के कारण अगर वे बीकानेर के लोगों के जहन में जिंदा रहते हैं , तो उनके लिए इस बढ़कर कुछ और नहीं होगा.
गुनगुनाते हुए लग गया शौक : सुराणा बताते हैं कि उन्हें रेडियो का शौक था और जिस तरह से लोग पसंदीदा फिल्मी गीतों को गुनगुनाते हैं इस तरह आकाशवाणी के एंकर की तर्ज पर गीतों की फरमाइश करने वालों के नाम गुनगुनाना शुरू कर दिए और यहीं से उनका यह शौक उनकी कला बन गया. हालांकि वे कहते हैं कि मैंने इसको लेकर कोई घंटे प्रैक्टिस नहीं की लेकिन धीरे-धीरे गुनगुनाने का शौक लगा तो खुद को भी लगा कि मैंने कुछ ऐसा पा लिया जो कि सामान्य नहीं है और फिर धीरे-धीरे यह मेरी पहचान बन गया.
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