जयपुर : राजधानी के एसएमएस अस्पताल में शनिवार को चिकित्सा इतिहास का नया अध्याय लिखा गया. यहां प्रदेश में लंबे समय बाद लाइव लिवर ट्रांसप्लांट किया गया. खास बात ये है कि इस ऑपरेशन में मरीज की जान उसकी पत्नी ने अपने जिगर का हिस्सा दान करके बचाई है. बिल्कुल वैसे ही जैसे पुराणों में सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण वापस लिए थे. जयपुर निवासी 42 वर्षीय व्यक्ति लंबे समय से लिवर संक्रमण से जूझ रहा था. उसकी हालत इतनी गंभीर हो चुकी थी कि डॉक्टरों ने लिवर ट्रांसप्लांट को ही अंतिम विकल्प बताया. ऐसे में पत्नी ने हिम्मत दिखाई और अपने जिगर का हिस्सा दान करने का फैसला लिया.
दो महीने की तैयारी, 15 घंटे का ऑपरेशन : लाइव लिवर ट्रांसप्लांट के लिए बीते दो महीने से तैयारी चल रही थी. डोनर और रिसिपिएंट के ब्लड ग्रुप, टिश्यू, लिवर साइज, मेडिकल हिस्ट्री सहित तमाम आवश्यक जांचें पूरी की गईं. रिसिपिएंट के लिवर का अधिकतर हिस्सा पूरी तरह खराब हो चुका था और बचा हुआ हिस्सा भी काम नहीं कर पा रहा था. ऐसे में उनकी पत्नी ही उनके लिए उम्मीद की आखिरी किरण बनीं. 15 घंटे के सफल ऑपरेशन के बाद फिलहाल डोनर और रिसीवर दोनों की स्थिति स्टेबल है. इसे लेकर एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ दीपक माहेश्वरी ने बताया कि लाइव लिवर ट्रांसप्लांट के लिए दो टीमों की आवश्यकता होती है जो एक ही समय पर एक साथ ऑपरेट करे. इस केस में पत्नी का करीब 40% लिवर पति को लगाया गया. इस ऑपरेशन के लिए एक बड़ी टीम का गठन किया गया था. इसमें सफलता मिलना पूरे प्रदेश के लिए एक बड़ी खुशखबरी है. उन्होंने कहा कि एसएमएस प्रदेश ही नहीं देश का बहुत बड़ा अस्पताल है, इसलिए वो चाहते हैं कि ये ट्रांसप्लांट का प्रोग्राम बहुत तेजी से चले.
अब तक 13 कैडेवर ट्रांसप्लांट, इस बार लाइव डोनेशन : एसएमएस अस्पताल में अब तक 13 लिवर ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं, लेकिन वे सभी कैडेवर (मृतक डोनर) से हुए थे. लेकिन शनिवार को जो ऑपरेशन हुआ उसमें जीवित व्यक्ति ने अपना लिवर दान किया है. इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि प्रदेश में ऐसे करीब 7000 मरीज हैं जिन्हें लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत है. निजी अस्पतालों में ये प्रक्रिया 20-25 लाख रुपए तक में होती है, जबकि एसएमएस में ये ऑपरेशन नि:शुल्क हुआ है और आगे सुविधाजनक लागत पर उपलब्ध होगा. इससे गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए जीवनदान का रास्ता खुलेगा.
इस तरह हुए मिलान :-
- ब्लड ग्रुप मिलान : डोनर और रिसिपिएंट का ब्लड ग्रुप समान
- टिश्यू टाइपिंग : मिलान जरूरी नहीं, लेकिन अधिकांश मामलों में किया जाता है
- एचएलए टेस्ट : सामान्यत: आवश्यक नहीं, मगर इस केस में मिलान किया गया
- लिवर का आकार और आकृति : रिसिपिएंट के शरीर के अनुरूप होना जरूरी
- मेडिकल हिस्ट्री : डोनर पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित पाया गया
डॉक्टर्स की टीम ने निभाई बड़ी भूमिका : ये लाइव लीवर ट्रांसप्लांट ऑपरेशन हेपेटो-पैंक्रियाटो-बिलियरी (HPB) सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. दिनेश कुमार भारती के नेतृत्व में किया गया. इस टीम में डॉ. आशुतोष पंचोली, डॉ. रजत जांगीड़, डॉ. सी.एस. चटर्जी, डॉ. पूनम कालरा, डॉ. ममता शर्मा, डॉ. योगेश मोदी, डॉ. महिपाल, डॉ. संजय, डॉ. सतवीर, डॉ. मीनू, डॉ. अनु भंडारी, डॉ. आयुष, डॉ. रिया और डॉ. आदित्य शामिल रहे. इसके अलावा विभागीय स्टाफ में डॉ. लीलम मीना, कपिल शर्मा, ममता, दुर्गा प्रसाद, रामअवतार और करण ने भी अहम भूमिका निभाई. वहीं एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. दीपक माहेश्वरी, एमएस डॉ. सुशील भाटी और डॉ. मनीष अग्रवाल ने विभिन्न स्तर पर सहयोग प्रदान किया.
चिकित्सा जगत में नई उम्मीद : बहरहाल, इस ट्रांसप्लांट के साथ ही राजस्थान में लिवर प्रत्यारोपण का नया अध्याय शुरू हो गया है. निजी अस्पतालों पर निर्भर रहने वाले मरीजों को अब प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में ये सुविधा मिल सकेगी.




















