जयपुर : बच्चों को कुपोषण से बचाने के सरकारी प्रयास नाकाफी हैं. राज्य में 1.86 लाख बच्चे कुपोषित हैं. यह आंकड़ा चिंताजनक है. यह हालात तो तब है, जब सरकार ना केवल विभिन्न सरकारी योजनाओं के जरिए उचित पोषण देने का प्रयास करती है. साथ ही हर साल 1 सितंबर से 7 सितंबर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाती है ताकि पोषण की अहमियत के बारे में जागरूक और स्वस्थ खाने की आदत बढ़ाई जा सके. असल में राष्ट्रीय पोषण सप्ताह केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और खाद्य एवं पोषण बोर्ड का सालाना कार्यक्रम है. इसके जरिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाने और उचित पोषण के बारे में जनता को शिक्षित करने संबंधी गतिविधियां की जाती हैं. राज्य में भी पोषण के महत्व पर कार्यक्रम होते हैं, लेकिन यहां कुपोषण गंभीर समस्या है. इससे निपटने को सरकारी योजनाएं चलाई जाती हैं, लेकिन सामुदायिक स्वास्थ्य ढांचा, जागरूकता की कमी और गरीबी पूरे पोषण की राह में रोड़ा है. एक्सपर्ट मानते हैं कि साल में एक बार पोषण सप्ताह मनाने से नहीं, हर दिन चुनौती समझकर कार्य करने की जरूरत है. पोषण को लेकर राजस्थान पर खास रिपोर्ट…
कुपोषण में करौली नंबर वन: राज्य में 1.86 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं, जबकि 18 हजार से ज्यादा बच्चे अतिकुपोषित हैं. विधानसभा में पूछे सवाल के जवाब में दी रिपाेर्ट के अनुसार, सबसे अधिक 18,888 कुपोषित बच्चे करौली में हैं, जबकि सबसे कम 64 कुपोषित बच्चे बूंदी में पाए गए. सामाजिक कार्यकर्ता विजय गोयल कहते हैं कि हम विकसित राजस्थान की कल्पना देखते हैं तो सबसे पहले उन बच्चों की ओर देखना होगा, जो प्रदेश और देश का भविष्य है?
कई जिले ऐसे हैं जहां कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों के आंकड़ों की संख्या डरावनी है. सरकारी स्तर पर भले कुछ भी दावे किए जा रहे हों, लेकिन आंकड़े काफी हैं, जो बताता है कि हमारे प्रयास नाकाफी हैं. गोयल ने कहा किआज हम भले पोषण सप्ताह मना रहे हों, लेकिन साल में मात्र 7 दिन अलग-अलग गतिविधियां करने से काम नहीं चलेगा. जरूरत है कि हम 365 दिन लगातार कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर काम करें.
कुपोषण की प्रमुख वजह और चुनौती
- बच्चे: 5 साल से कम के बच्चों में औसत से कम लंबाई (स्टंटिंग), वजन कम (वेस्टिंग), और एनीमिया की दर अधिक. NFHS-5 के अनुसार, बच्चों में एनीमिया दर में वृद्धि हुई, जो चिंताजनक है.
- महिलाएं: 15-49 साल की महिलाओं में बड़ी संख्या एनीमियाग्रस्त हैं, जो मातृ स्वास्थ्य को प्रभावित करता है.
- आदिवासी क्षेत्र: बारां, बांसवाड़ा, डूंगरपुर जैसे आदिवासी बहुल जिलों में कुपोषण ज्यादा गंभीर समस्या है. इनके पास पौष्टिक भोजन और स्वास्थ्य सेवा की पहुंच सीमित है.
- गरीबी और जागरूकता की कमी: पौष्टिक भोजन की कमी, गरीबी और कुपोषण के प्रति सही जानकारी का अभाव कुपोषण के मुख्य कारणों में है.
- स्वास्थ्य सेवा तक अपर्याप्त पहुंच: सामुदायिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवा और पोषण कार्यक्रमों का लाभ सभी तक नहीं पहुंच पाता. इससे कुपोषित बच्चों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता.
- कुपोषण-गरीबी का चक्र: कुपोषण से सेहत और कार्यक्षमता घटती है. इससे गरीबी बढ़ती है. यह चक्र कुपोषण को और गहरा करता है.
- चुनौतियां: सेवा वितरण ढांचे में खामियां, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका में कमी और समुदाय तक पहुंच की कमी जैसी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं
WHO के हिसाब से कुपोषण और अति कुपोषण के मापदंड
लड़कों में
- जन्म के समय औसत वजन 3.3 किलो होना चाहिए, 2 से 2.5 किलो का बच्चा कुपोषित और 2 किलो से कम अति कुपोषित
- 6 माह में वजन 7.9 किलो होना चाहिए. 6.4 किलो वजन है तो कुपोषित व 5.7 किलो से कम अति कुपोषित
- 12 माह में वजन 9.5 किलो होना चाहिए. 7.7 किलो वजन है तो कुपोषित एवं 6.9 किलो से कम है तो अति कुपोषित
- 24 माह में वजन 12.2 किलो होना चाहिए. 9.7 किलो वजन है तो कुपोषित व 8.7 किलो से कम वजन अति कुपोषित
- 36 माह में वजन 14.3 किलो होना चाहिए. 11.3 किलो वजन है तो कुपोषित एवं 10.2 किलो से कम है तो अति कुपोषित
- 48 माह में वजन 16.3 किलो होना चाहिए. 12.9 किलो वजन है तो कुपोषित एवं 11.7 किलो से कम वजन अति कुपोषित
- 60 माह में वजन 18.3 किलो होना चाहिए. 14.5 किलो वजन है तो कुपोषित एवं 13.2 किलो से कम वजन अति कुपोषित
लड़कियों में
- जन्म के समय औसत वजन 3.2 किलो होना चाहिए, 2 से 2.4 किलो है तो कुपोषित एवं 2 किलो से कम अति कुपोषित
- 6 माह में वजन 7.3 किलो होना चाहिए. 5.9 किलो वजन है तो कुपोषित व 5.2 किलो से कम अति कुपोषित
- 12 माह में वजन 8.9 किलो होना चाहिए. 7.3 किलो है तो कुपोषित एवं 6.6 किलो से कम अति कुपोषित
- 24 माह में वजन 11.5 किलो होना चाहिए. 9.2 किलो वजन है तो कुपोषित एवं 8.2 किलो से कम अति कुपोषित
- 36 माह में वजन 13.9 किलो होना चाहिए. 11 किलो है तो कुपोषित एवं 9.9 किलो से कम अति कुपोषित
- 48 माह में वजन 15.9 किलो होना चाहिए. 12.7 किलो वजन है तो कुपोषित एवं 11.4 किलो से कम अति कुपोषित
- 60 माह में वजन 17.9 किलो होना चाहिए. 14.3 किलो वजन है तो कुपोषित एवं 12.9 किलो से कम अति कुपोषित
सरकार की योजनाएं: राज्य सरकार ने कुपोषण से निपटने के लिए समेकित बाल विकास सेवाएं (ICDS), मिड-डे-मील, और राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण पोषण जैसी कई योजनाएं चला रखी है. समुदाय आधारित मॉडल से तीव्र कुपोषण प्रबंधन (CMAM) मॉडल पर ध्यान केंद्रित कर रही है. इसमें सामुदायिक स्वयंसेवकों को कुपोषित बच्चों की पहचान और इलाज में शामिल किया है. कुपोषित बच्चों को लक्षित आहार और देखभाल के लिए आंगनबाड़ी और पोषण देखभाल केंद्र (NCC) खोले हैं. आंगनबाड़ी केंद्रों पर 6 माह से 3 वर्ष तक के सामान्य बच्चों को 480 ग्राम मूंग दाल एवं चावल की खिचड़ी, 540 ग्राम सादा गेहूं दलिया, 480 ग्राम मीठा दलिया और 1375 बालाहार प्रीमिक्स दिया जाता है. अतिकुपोषित बच्चों को 500 ग्राम दलिया और खिचड़ी के साथ 1125 ग्राम बालाहार प्रीमिक्स के दो पाउच दिए जाते हैं. 3 से 6 वर्ष तक बच्चों को 1550 ग्राम बलाहार प्रीमिक्स दिया जाता है. सभी बच्चों को मीठा मुरमुरा, नमकीन मुरमुरा भी देते हैं. विजय गोयल कहते हैं कि ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों के साथ बॉर्डर और आदिवासी इलाकों में योजनाओं का सही तरीके से उपयोग नहीं हो रहा. इसके चलते जिस गति से आंकड़ों में कमी आनी चाहिए थी, वो नहीं आ पा रही.
यह होना चाहिए सुधार: सामाजिक कार्यकर्ता विजय गोयल ने बताया कि कुपोषित बच्चों के लिए पौष्टिक आहार और सुरक्षित भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना, स्तनपान को बढ़ावा देना, पूरक पोषण देना, स्वास्थ्य सेवाओं का समर्थन और समुदाय स्तर पर जागरूकता की जरूरत है. आंगनबाड़ी स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित हो. आंगनबाड़ी में कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों के लिए पोषाहार की सही मॉनिटरिंग हो. गर्भवती महिलाओं को नियमानुसार पौष्टिक आहार दें तो फायदा हो सकता है. यह सरकार और सामाजिक संगठनों के सामूहिक प्रयास के जरिए संभव है.
यह बोले शिशु रोग विशेषज्ञः शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अंकित अग्रवाल ने बताया कि गर्ववती मां के खान-पान पर बहुत ध्यान रखने की जरूरत है, जन्म के समय बच्चा स्वस्थ हो. कुपोषण से बचने के लिए एक स्वस्थ और संतुलित आहार की जरूरत होती है, उसी के अनुसार पोषाहार दिया जाना चाहिए. इसमें फल, सब्जियां, अनाज, प्रोटीन और डेयरी उत्पाद शामिल है. नियमित भोजन करें, खूब पानी पिएं, और बाहरी जंक फूड से बचें. डॉ अंकित कहते हैं कि एक स्वस्थ जीवनशैली कुपोषण से बचाव में महत्वपूर्ण है. कई बार देखने में आता है की छोटी-छोटी लापरवाही की वजह से बच्चों में प्रोटीन की मात्रा जो होनी चाहिए वह नहीं हो पाती है. कम वजन की वजह से बच्चे को कुपोषण की श्रेणी में चले जाते हैं. उन्होंने कहा कि आदिवासी और ग्रामीण आंचल में कुपोषित बच्चों के मामले ज्यादा सामने आते हैं, हालांकि सरकार की ओर से लगातार प्रयास किया जा रहे हैं. पिछले सालों की तुलना में आंकड़ों में काफी अच्छा सुधार हुआ है.




















