जयपुर: राजस्थान की बीजेपी सरकार पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की ओर से बनाए गए नगरीय निकायों का डिमोशन कर रही है. जयपुर, जोधपुर और कोटा जहां कांग्रेस सरकार ने दो-दो निगम बनाए थे वहां एक निगम किया जा रहा है. वहीं, बीते दिनों केकड़ी, सांचौर, नीम का थाना और शाहपुरा को नगर परिषद से दोबारा नगर पालिका बनाया गया. नगरीय निकायों के इस डिमोशन पर कांग्रेस ने बीजेपी सरकार की नियत में खोट बताया. जबकि यूडीएच मंत्री ने नगरीय निकायों का प्रमोशन और एक शहर में दो निगम करने को बिना मापदंड और नियम कायदों के परे व्यक्तिगत और पार्टी हित में लिया गया फैसला बताया.
राज्य में शहरी निकाय चुनाव को लेकर सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच की खींचतान चल रही है. जहां राज्य सरकार एक साथ सभी 309 निकायों में चुनाव कराना चाहती है, वहीं आयोग की ओर से 49 निकायों में चुनावी तैयारी शुरू की गई है. इस बीच विपक्ष ने एक बार फिर नगरीय निकायों के डिमोशन का मुद्दा और उठा दिया है. पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास में कहा कि जयपुर, जोधपुर, कोटा में दो नगरीय निकाय बनाए थे. उसकी सोच यही थी कि डेवलपमेंट हो, वार्ड छोटे होंगे तो जनता का जुड़ाव रहेगा. सफाई और विकास का काम तेजी से होगा, लेकिन बीजेपी उल्टी चल रही है. कांग्रेस ने जो अच्छे काम किए उनको उल्टा करना है.
आज प्रदेश के स्कूलों में छते गिर रही हैं, मौत हो रही है. ऐसी दुर्घटनाओं पर कांग्रेस 50 लाख मुआवजा देती थी. बीजेपी 10 लाख मुआवजा दे रही है. ये पाप की पराकाष्ठा है. उन्होंने कहा कि ये दो निगमों को एक कर सकते हैं, छोटे वार्ड को बड़ा कर सकते हैं, लेकिन बड़े वार्ड में काम नहीं होगा. बीजेपी की नियत में खोट है और जब नियत में खोट होती है तो बरकत नहीं होती. राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के सरकार के नेताओं के आंख का पानी मर गया. इसलिए जनता की आंख में जो पानी आ रहा है, वो उन्हें नजर नहीं आ रहा. लोग पानी में तैर रहे हैं, नाले साफ नहीं कराए गए, राजधानी जयपुर तक के नाले साफ नहीं हुए, जहां से मुख्यमंत्री खुद विधायक हैं. इसके इतर नगर निगम और नगरीय निकायों को लेकर के राजनीति कर रहे हैं.
कांग्रेस के इस आरोप पर यूडीएच मंत्री ने पलटवार करते हुए कहा कि सरकार के स्तर पर जो फैसले होते हैं, कुछ फैसले जनहित में लिए जाते हैं, कुछ फैसले व्यक्तिगत हित में लिए जाते हैं और कुछ फैसले पार्टी विशेष के हित में लिए जाते हैं. 2018 से 2023 के कालखंड में तत्कालीन सरकार ने जितने भी फैसले लिए चाहे एक-एक निगम को दो-दो निगम बनाना हो या फिर दूसरी प्रशासनिक इकाइयों का सृजन करना हो वो व्यक्तिगत लाभ और पार्टी हित में किए गए निर्णय थे. उनसे आमजन के हित का कोई सरोकार नहीं था.
नगरीय निकाय बनाने और उनका क्रमोन्नयन करने के लिए नियम कायदे बने हुए हैं. इसी तरह से नई प्रशासनिक इकाइयां बनाने के लिए भी कुछ मापदंड निर्धारित किए हुए हैं, लेकिन पिछली सरकार ने ना मापदंडों की परवाह की ना नियम कायदों की परवाह की और मनमाने तरीके से फैसले लिए गए. उन्होंने कहा कि 2023 के विधानसभा चुनाव परिणाम को देखें उनके निर्णय को आम जनता ने स्वीकार नहीं किया है. उन्होंने जितने जिले सृजित किए अधिकांश जगह उनकी पार्टी के उम्मीदवार चुनाव हारे हैं. इसका अर्थ ये है कि वो निर्णय जनता के हित में नहीं थे.
राजस्थान में नगरीय निकाय गठन के मापदंड :
नगर निगम :
जनसंख्या – 5 लाख या उससे अधिक.
जनसंख्या घनत्व – 1000 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी या अधिक.
आर्थिक महत्व – उच्च आर्थिक महत्व, पर्याप्त राजस्व स्रोत और 50% से अधिक जनसंख्या का कृषि से भिन्न गतिविधियों में नियोजन.
नगर परिषद :
जनसंख्या – 1 लाख से 5 लाख के बीच.
जनसंख्या घनत्व – 500 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी या अधिक.
आर्थिक महत्व – उच्च आर्थिक महत्व, पर्याप्त राजस्व स्रोत और 25% से अधिक जनसंख्या का कृषि से भिन्न गतिविधियों में नियोजन.
नगर पालिका :
जनसंख्या – 10 हजार से 1 लाख तक
जनसंख्या घनत्व – 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी या अधिक.
आर्थिक महत्व – उच्च आर्थिक महत्व, पर्याप्त राजस्व स्रोत और 10% से अधिक जनसंख्या का कृषि से भिन्न गतिविधियों में नियोजन.




















