झालावाड़ : जिले में हुए पीपलोदी स्कूल हादसे के बाद ग्रामीण मोर सिंह ने अपने पुरखों के मकान को अस्थाई स्कूल के लिए निःशुल्क दान किया है. मोर सिंह की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है, लेकिन अपने मकान को अस्थाई स्कूल के लिए निःशुल्क देकर इन्होंने दान की अनूठी मिसाल पेश की है. वहीं, अब दानदाता मोर सिंह खुद गांव में ही तिरपाल से बनाई गई एक छोटी सी टापरी में अपने 8 सदस्यी परिवार के साथ जीवन बिता रहे हैं.
गांव को तरक्की की राह पर ले जाने का सपना : मोर सिंह खुद पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन वह शिक्षा का महत्व जानते हैं. इस कारण उन्होंने अपने तीनों बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का फैसला किया है. मोर सिंह का कहना है कि स्कूल हादसे के बाद स्कूल की बिल्डिंग पूरी तरह से नष्ट हो गई. शिक्षा विभाग को अस्थाई स्कूल की तलाश थी, जिसके बाद उन्होंने अपने पुरखों के मकान को ही स्कूल के लिए निःशुल्क देने का फैसला किया. गांव में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या काफी कम है. वह गांव और अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं. गांव में सब पढ़े लिखे होंगे तो गांव की तरक्की निश्चित है. वह छोटी सी टापरी में अपने परिवार के साथ बेहद खुश हैं. जब तक शिक्षा विभाग की ओर से गांव में ही एक स्कूल स्थाई तौर पर तैयार नहीं कर लिया जाता, तब तक वह गांव में अपने परिवार के साथ टापरी में रहेंगे.
300 रुपए के तिरपाल, बांस-डंडों से बनाई टापरी : दानदाता मोर सिंह के लिए पुरखों के मकान को अस्थाई स्कूल के लिए देना आसान नहीं रहा. इस राह में कई रोड़े भी आए. परिवार के सदस्य सहमत नहीं थे. परिवार के लिए सिर छुपाने के लिए जगह नहीं थी, लेकिन सभी बाधा को दरकिनार कर उन्होंने अपने घर को स्कूल के लिए निःशुल्क दान कर दिया. मोर सिंह की इस दरियादिली को देख अब उनके परिवार के लोग भी उनके कायल हो गए हैं. सभी सदस्य हंसी-खुशी अपना जीवन बिता रहे हैं. अपना घर अस्थाई स्कूल को देने के बाद उन्होंने अपने खेत के नजदीक बाजार से 300 रुपए का तिरपाल, लकड़ी के बांस व कुछ डंडों की सहायता से एक टापरी बनाई है, जिसमें सभी लोग रह रहे हैं.
बकरियां और 8 लोगों के परिवार की जिम्मेदारी : मोर सिंह के पास गांव में ही उनकी दो बीघा जमीन है, जिस पर वह मौसमी फसल मक्का, गेहूं उगा कर अपने 8 लोगों के परिवार का पालन पोषण करते हैं. घर में कुछ बकरियां भी मौजूद हैं. 8 सदस्य परिवार में दो लड़कियां, बेटा-बहु, पत्नी और पोते की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है. मोर सिंह ने बताया कि उनके दोनों बेटियों को वह पढ़ा लिखा कर काबिल बनना चाहते हैं. एक बेटी पास के सीनियर सेकेंडरी स्कूल आवल हेड़ा में कक्षा 12 में पढ़ रही है, जबकि छोटी बेटी कक्षा 9 में अध्ययन कर रही है. वह अपनी बड़ी बेटी को शिक्षक बनता हुआ देखना चाहते हैं. उनका कहना है कि जब तक गांव में बच्चे पढ़ लिख कर काबिल नहीं बनेंगे जब तक गांव की तरक्की नहीं होगी.
मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी ने ये कहा : इस संबंध में जिले के मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी राम सिंह मीणा ने बताया कि पीपलोदी स्कूल हादसे के बाद हुई विभाग की बैठक में गांव के ही मोर सिंह ने अपना मकान अस्थाई स्कूल बनाने के लिए दान दिया है. इसके लिए उन्होंने किसी भी प्रकार का शुल्क लेने की इच्छा नहीं जताई है. मोर सिंह के मकान का रंग रोगन करवाकर उसे पूरी तरह से अस्थाई स्कूल में बदला गया है. अभी फिलहाल स्कूल में पांच कमरे, बरामदा, चौक मौजूद हैं. वहीं, विद्यालय में चार शिक्षकों की ओर से अध्यापन कार्य प्रतिदिन कराया जा रहा है. गांव के मोर सिंह ने गांव में स्थाई स्कूल का निर्माण नहीं होने तक अपने मकान को अस्थाई स्कूल के लिए देने की इच्छा जताई है. मोर सिंह ने विभाग को बताया कि उसके पास गांव में रहने के लिए पर्याप्त जगह मौजूद है. ऐसे में वह अपने मकान को अस्थाई स्कूल के लिए देना चाहता है.
घायल हुए बच्चे भी प्रतिदिन स्कूल आ रहे हैं : वर्तमान में पीपलोदी स्कूल के कार्यवाहक प्रिंसिपल राजेश महेश्वरी ने बताया कि मोर सिंह की ओर से अपने मकान को अस्थाई स्कूल के लिए देने का कार्य उनकी महानता को दर्शाता है. ऐसे लोग दुर्लभ मिलते हैं. गांव में स्कूल का नियमित संचालन होने से अब यहां के बच्चों का नियमित शिक्षण कार्य जारी है. नए माहौल में बच्चे काफी उत्साह से स्कूल में पहुंच रहे हैं. हादसे में घायल हुए बच्चे भी प्रतिदिन स्कूल आ रहे हैं. मोर सिंह की यह पहल इतिहास में याद रखी जाएगी. गांव के बच्चे पढ़ लिखकर गांव की तरक्की का रास्ता खोलेंगे.
ये थी घटना : 25 जुलाई 2025 को सुबह बच्चे स्कूल पहुंचने के बाद प्रार्थना के लिए जा रहे थे, तभी स्कूल भवन का एक कमरा अचानक गिर गया. छत गिरने से बच्चे दब गए. इसमें 7 बच्चों की मौत हो गई थी, जिनमें 3 बालिकाएं और 4 बालक शामिल थे. जान गंवाने वालों में पायल, प्रियंका, हरीश, सतीश, कान्हा, कुंदन और मीना हैं. इनमें कान्हा और मीना सगे भाई-बहन थे. बच्चों की उम्र 8-13 वर्ष के बीच थी.




















