केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के पिता दाऊलाल वैष्णव का मंगलवार सुबह निधन हो गया। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और जोधपुर एम्स में भर्ती थे। 11 बजकर 52 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर जैसे ही फैली, जोधपुर के साथ-साथ पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई। जीवन भर सामाजिक कार्यों और सादगी की मिसाल रहे दाऊलाल वैष्णव की अंतिम यात्रा मंगलवार दोपहर जोधपुर के कागा स्थित वैष्णव समाज के श्मशान घाट तक निकाली गई। इस दौरान कई गणमान्य व्यक्ति, राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी और समाजजन मौजूद रहे।
पाली जिले के जीवंद कला गांव से ताल्लुक रखने वाले दाऊलाल वैष्णव न सिर्फ अपने गांव के सरपंच रह चुके थे, बल्कि उन्होंने वकालत और कर सलाहकार के रूप में भी जोधपुर में सम्मानजनक पहचान बनाई। उनका जीवन कर्म, सादगी और सेवा का उदाहरण रहा। वे लंबे समय से रातानाडा भास्कर चौराहा के पास महावीर कॉलोनी में रह रहे थे।
दाऊलाल वैष्णव के जीवन की एक घटना आज भी लोगों को भावुक कर देती है। जब 2 अक्टूबर 2021 को अश्विनी वैष्णव रेल मंत्री बनने के बाद पहली बार जोधपुर आए थे, तो पिता-पुत्र की मुलाकात बेहद सीमित समय के लिए हो सकी। उस संक्षिप्त मुलाकात में भी पिता ने बेटे को एक पत्र सौंपा था। उस पत्र में लिखा था—
“कर्तव्य को इतनी निष्ठा से निष्पादित करो कि हर रेल यात्री का चेहरा यात्रा के दौरान फूल सा खिला रहे।”
इस एक पंक्ति में उस पिता की सोच और बेटे के प्रति उम्मीदें साफ झलकती हैं, जिसने खुद जीवनभर मेहनत की, पर कभी दिखावे की चाह नहीं रखी। यह चिट्ठी केवल सलाह नहीं थी, बल्कि एक ऐसे पिता का आशीर्वाद थी, जो सार्वजनिक जीवन में बेटे की हर जिम्मेदारी को पूरे गर्व और विश्वास के साथ देखता था।
विनम्रता और समाजसेवा से भरा जीवन
दाऊलाल वैष्णव का जीवन किसी आदर्श पाठ की तरह रहा। उन्होंने कभी राजनीति में ऊंचे पद नहीं मांगे, पर गांव के सरपंच के रूप में उन्होंने जो जिम्मेदारियां निभाईं, वे आज भी लोगों को याद हैं। उन्होंने कभी अपने बेटे की पदवी का लाभ नहीं लिया, बल्कि हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे। जोधपुर में रहकर उन्होंने समाज के कई लोगों की कानूनी और कर मामलों में मदद की, बिना किसी स्वार्थ के।
परिवार में शोक, लेकिन लोगों की यादों में अमर
दाऊलाल वैष्णव अपने पीछे पत्नी सरस्वती वैष्णव, बड़े बेटे अश्विनी वैष्णव और छोटे बेटे आनंद वैष्णव को छोड़ गए हैं। लेकिन वे सिर्फ एक परिवार के सदस्य नहीं थे, वे समाज के लिए एक मार्गदर्शक थे। उनका जाना सिर्फ एक पिता का जाना नहीं है, बल्कि एक युग का अंत है—जो संयम, मूल्य और संस्कारों से जुड़ा था।
आज जब देश के रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव देश के हर कोने को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं, उनके पीछे वह प्रेरणा है जो उन्हें जीवनभर रास्ता दिखाती रही—वो उनके पिता, दाऊलाल वैष्णव की चिट्ठी, उनका आशीर्वाद और उनके जीवन के मूल्य। उस चिट्ठी की पंक्तियां अब केवल शब्द नहीं, बल्कि रेल मंत्रालय की हर सांस में जीवित आदेश बन चुकी हैं।




















