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टॉप रिजल्ट के बाद भी कोटा की तरफ आकर्षित नहीं हो रहे हैं स्टूडेंट्स, लाखों से हजारों में पहुंची संख्या

कोटाः देशभर में मेडिकल और इंजीनियरिंग एंट्रेंस की कोचिंग के लिए कोटा खास स्थान रखता है. लगातार कोटा से अच्छे रिजल्ट भी आ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद भी यहां स्टूडेंट्स की संख्या कम हो रही है. हालात यह है कि स्टूडेंट्स की संख्या लाखों से अब हजारों में पहुंच गई है. कोटा कोचिंग इंडस्ट्री के जानकारों के मुताबिक इस बार 90 हजार के आसपास बच्चे पढ़ने के लिए आए हैं, जबकि यह संख्या साल 2022 में 2 लाख से भी ज्यादा थी. स्टूडेंट्स की घटती संख्या का असर पूरे इंडस्ट्री पर देखने को मिल रहा है.

स्टूडेंट्स की संख्या घटने से हॉस्टल्स में ऑक्युपेंसी कम हो गई है. मैस में खाना खाने वाले बच्चे कम हैं, यहां तक कि रोजगार भी कम हो गया है. कोटा की इंडस्ट्री को झटका लगने के साथ संस्थाओं ने छटनी भी की है. एजुकेशन एक्सपर्ट देव शर्मा का कहना है कि 36 साल पहले कोटा में कोचिंग शुरू हुई थी. ये 2022 में पीक पर पहुंच गई थी. इस अवधि में कई झटके सहे हैं, लेकिन इस बार लंबा गैप लग गया है. इंडस्ट्री में कई बार बीच में गिरावट आई, लेकिन सकारात्मक प्रयास से यह ऊंचा उठ गया था. वर्तमान में भी सकारात्मक प्रयासों को प्रचारित करना होगा.

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कोटा से सर्वाधिक सिलेक्शनः एजुकेशन एक्सपर्ट देव शर्मा का कहना है कि कोटा निश्चित रूप से पढ़ाई के लिहाज से बेहतर शहर है. आने वाले समय में वापस बुलंदियों पर पहुंचेगी, क्योंकि यहां से बड़ी संख्या में सिलेक्शन हर साल हो रहे हैं, यहां तक कि टैलेंट की असली परीक्षा लेने वाली इन परीक्षाओं में टॉपर्स कैंडिडेट्स भी कोटा से ही निकल रहे हैं. देव शर्मा का कहना है कि लगातार कोटा से टॉपर्स नीट यूजी और जेईई में सामने आते रहे हैं. इसके साथ ही सर्वाधिक सिलेक्शन भी कोटा ही पूरे देश में दे रहा है. ऐसा लंबे समय से हो रहा है, इसके बावजूद कोटा की छवि को खराब करने की कोशिश के चलते ही बच्चों की संख्या कम हुई है.

उन्होंने बताया कि दूसरी जगह पर केंद्र खुलना भी इसका एक कारण है. कोटा हॉस्टल एसोसिएशन के अध्यक्ष नवीन मित्तल का कहना है कि साल 2022 में जहां पर 2.15 लाख बच्चे कोटा में कोचिंग करने के लिए आए थे. उसके बाद 2023 में संख्या कम होकर 1.75 लाख हुई. साल 2024 में यह संख्या 1.22 लाख थी. इसके बाद साल 2025 में 90 हजार रह गई है. नवीन मित्तल का कहना है कि आने वाले एक-दो साल में वापस कोटा की तरफ बच्चे डाइवर्ट हो जाएंगे, क्योंकि कोटा की खासियत रिजल्ट में लगातार सामने आ रही है.

टॉपर से लेकर हजारों सिलेक्शन कोटा सेः एजुकेशन एक्सपर्ट देव शर्मा का कहना है कि जेईई एडवांस्ड में साल 2025 में कोटा निवासी राजित गुप्ता व 2024 में भी कोटा से ही कोचिंग कर रहे वेद लाहोटी टॉपर थे. जेईई मेन में हर साल कोटा से 3 से 4 स्टूडेंट 100 परसेंटाइल के क्लब में शामिल रहते हैं. नीट की बात की जाए तो 2021 में पढ़ रहे शोएब आफताब ऊपर रहे थे. 2022 में भी कोटा से कोचिंग कर रही तनिष्का यादव टॉपर रही थी. इसी तरह से 2024 में कई बच्चों के परफेक्ट स्कोर बने थे. इनमें कोटा के कैंडिडेट्स भी शामिल थे. इसके अलावा हजारों की संख्या में नीट में सिलेक्शन कैंडिडेट्स का हुआ है. जिनके अच्छे परिणाम होने से उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज में भी सीट मिल जाएगी.

चार साल में आधी रह गई है कोचिंग इंडस्ट्रीः कोटा व्यापार महासंघ के महासचिव अशोक माहेश्वरी का कहना है कि बच्चों की संख्या कम होने का असर पूरी इंडस्ट्री पर नजर आ रहा है. यहां तक कि लगातार यह असर बढ़ता ही जा रहा है. यह एक चिंता का विषय कोटा के लिए है. मौजूदा स्थिति में सिंगल रूम व पीजी हॉस्टल मिलाकर ढाई लाख हैं, लेकिन बच्चे इनके आधे से भी कम हैं. बच्चों की कमी का असर रेहड़ी वाले से लेकर शोरूम और मॉल तक भी पहुंच गया है. इसका असर फल, सब्जी, जूस, स्टेशनरी, गारमेंट्स, जनरल स्टोर, किराना, सैलून, डेयरी सहित हर ट्रेड में नजर आ रहा है. ऑटो व टैक्सी से लेकर ट्रैवल्स पर भी असर आया है. उनका कहना है कि इंडस्ट्री जहां पर 6000 करोड़ से भी ज्यादा की थी, यह 3000 करोड़ के आसपास रह गई है. कोचिंग एरिया के शॉपकीपर ही इससे परेशान नहीं हैं. होलसेल और स्टॉकिस्ट तक को भी इसका असर नजर आने लगा है.

किराया पहुंचा 7 से 10 हजार, ज्यादातर रूम रहते हैं खालीः हॉस्टल का किराया भी इसके चलते कम हो गया है. पहले जहां कोटा में एक सामान्य एसी रूम सभी सुविधाओं को मिलाकर 10 से 15 हजार रुपए के बीच मिल रहा था, वर्तमान में यह 7 से 10 हजार रुपए के बीच पहुंच गया है. कई इलाकों में बच्चे कम हैं और हॉस्टल्स के रूम की संख्या ज्यादा है. ऐसे में वहां पर किराया कम है. इनमें शहर का बाहरी इलाका है. वहां पर कोचिंग की बिल्डिंग की कैपेसिटी के आधार पर हॉस्टल्स तैयार हुए, लेकिन बच्चों की संख्या कोचिंग बिल्डिंगों की क्षमता से कम है. बड़ी संख्या में हॉस्टल्स बंद हैं. नवीन मित्तल का यह भी कहना है कि बच्चे पहले जहां 10 से 11 महीने कोटा में ही रहते थे, अब यह समय अवधि भी कम हो गई है. पहले यहां पर रहकर ही एग्जाम तक की तैयारी करते थे. साथ ही परीक्षाएं भी कोटा से जाकर देते थे. अब ऐसा नहीं हो रहा है, अधिकांश बच्चे कोर्स खत्म होते ही हॉस्टल छोड़कर चले जाते हैं. कोटा में 2.30 लाख के आसपास सिंगल रूम हैं, लेकिन आधे से भी ज्यादा खाली हैं. उन्होंने बताया कि ऑक्युपेंसी 40 फीसदी के आसपास है.

प्रॉपर्टी का किराया भी रह गया आधाः नए कोटा में अधिकांश मकान मालिकों के पास अच्छा खासा किराया आ रहा था. यहां तक कि शोरूम और दुकानों मालिकों को भी अच्छा खासा पैसा मिल रहा था. अब कोचिंग एरिया में जहां पर प्रॉपर्टी का किराया ज्यादा था, वह गिर गया है. कोचिंग एरिया में जहां पीजी के रूप में कमरा किराए से चले जाते थे, अब अधिकांश एरिया में यह कमरे खाली हैं. दुकानों का महंगा किराया होने से किराएदार संचालक को फायदा नहीं हो रहा है, इसीलिए वह खाली कर रहे हैं. कोचिंग एरिया का लगभग हर दुकानदार इससे प्रभावित रहा है. इसमें मोबाइल व वॉच रिपेयर से लेकर रेस्टोरेंट और फूड कोर्ट तक भी शामिल हैं.

कहीं 30 तो कहीं 60 फीसदी ऑक्यूपेंसीः नवीन मित्तल ने बताया कि वर्तमान में राजीव गांधी नगर एरिया, जिसमें ऑक्सीजोन, राजीव गांधी नगर, न्यू व ओल्ड राजीव गांधी नगर और स्पेशल आता है. यहां पर सर्वाधिक करीब 25 हजार के आसपास बच्चे हैं. इस इलाके के हॉस्टल्स में करीब 60 से 70 प्रतिशत तक ऑक्युपेंसी है, जबकि जवाहर नगर एरिया में जिसमें तलवंडी, जवाहर नगर, बसंत विहार, केशवपुरा बालाकुंड में 18 हजार बच्चे हैं. कोचिंग से दूरी के आधार पर बच्चों का ऑक्युपेंसी प्रतिशत कम हो जाता है. इसी तरह से लैंडमार्क एरिया में 20 हजार बच्चे हैं. इसमें कमला उद्यान, पार्श्वनाथ, हाउसिंग बोर्ड, अंबेडकर नगर और कुन्हाड़ी व इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड का पूरा एरिया है. यहां ऑक्युपेंसी 30 फीसदी के आसपास है. इसी तरह से कोरल पार्क में करीब 9 से 10 हजार बच्चे हैं, जबकि यहां ऑक्युपेंसी 30 फीसदी के आसपास है. इसी तरह से विज्ञान नगर, इंडस्ट्रियल एरिया रोड नंबर एक से लेकर सात, इलेक्ट्रॉनिक कॉम्प्लेक्स व अनंतपुरा इलाके में 8 हजार स्टूडेंट्स हैं, शेष महावीर नगर और अन्य इलाके में 9 से 10 हजार बच्चे हैं.

बंद हो गए हैं मैस, मुनाफा भी हुआ कमः मैस संचालक जितेंद्र मेड़तवाल “मोंटू” का कहना है कि बीते साल से उनके संचालित मैस में बच्चों की संख्या 20 से 25 फीसदी कम हुई है. पहले लगातार बच्चे पढ़ रहे थे, लेकिन अब लगातार बच्चे कम हो रहे हैं. उन्होंने बताया कि उनके खुद के महावीर नगर प्रथम स्थित मैस में पहले 500 बच्चे थे, लेकिन इस बार संख्या 400 ही रह गई. उनका यह भी कहना है कि बच्चों की संख्या कम हो गई है, लेकिन खर्चे कम नहीं हुए हैं. स्टाफ की सैलरी से लेकर बिल्डिंग का किराया वही जा रहा है. हमारा मुनाफा कम हो गया है. बच्चों की संख्या ज्यादा रहने पर प्रॉफिट ज्यादा था, इस बार काफी असर हुआ है. मेड़तवाल का यह भी कहना है कि काफी संख्या में मैस संचालकों ने तो अपना यह काम भी बंद कर दिया है. यहां तक कि मार्जिन भी अब कम हो रहा है.

बड़े शहरों में कोटा कोचिंग, फिर यहां क्यों आएंगे?: कोचिंग इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि बड़े कोचिंग संस्थानों ने बाहर मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने के लिए केंद्र खोल दिए हैं. ज्यादातर यह केंद्र उत्तर प्रदेश और बिहार में खोले गए हैं. वहां की लगभग हर बड़ी सिटी में कोटा कोचिंग का सेंटर हैं. इसके चलते बच्चे कोटा कम आ रहे हैं. दूसरी तरफ इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों का मानना है कि आत्महत्या से कोटा के बारे में माहौल नेगेटिव हो गया है. पेरेंट्स बच्चों को भेजने से कतरा रहे हैं. ऑफलाइन से ऑनलाइन कोचिंग में कम बजट में घर बैठे पढ़ाई होने के चलते बच्चे इसका सहारा लेने लगे हैं. साथ ही सरकार ने 16 साल और दसवीं के बाद कोचिंग की गाइडलाइन जारी की थी, हालांकि यह नियम नहीं है, लेकिन फिर भी इसके चलते भी कई पेरेंट्स बच्चों को भेजने से डर रहे हैं. सीबीएसई ने भी डमी एडमिशन पर सख्ती की है, इसके चलते बाहर के बच्चे मोटा आकर पढ़ने से कतरा रहे हैं.

कोटा केयर्स से लेकर कई तरह के प्रयास कियाः कोटा में कोचिंग के बच्चों की सुरक्षा और लगातार हो रही कमी पर प्रशासन ने भी काफी काम किया है. इसके साथ ही कोचिंग संस्थान हॉस्टल एसोसिएशन भी इसमें जुड़कर काम कर रही थी. कोचिंग स्टूडेंट के बेहतरीन के लिए कोटा केयर्स अभियान भी शुरू किया गया. पुलिस प्रशासन ने पैनिक ऐप से लेकर कई तरह की व्यवस्था की. प्रशासनिक अधिकारियों ने बच्चों के साथ समस्याओं को सुलझाने के लिए आयोजन शुरू किए है. यह सब कुछ चल रहा है. इसके अलावा कोचिंग संस्थानों ने भी बड़े स्तर पर काउंसलिंग और वेल बीइंग के कार्य कर रहे हैं. बच्चों की वन टू वन काउंसलिंग भी हो रही है.

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