जयपुर: राजधानी जयपुर की पहचान केवल भव्य महलों और हवेलियों से नहीं है, बल्कि इसकी नींव में धर्म और आस्था की गहरी जड़ें भी शामिल हैं. सवाई जयसिंह द्वितीय ने गुलाबी नगर बसाया था, तभी ये सुनिश्चित किया कि शहर का हर प्रमुख हिस्सा देवी-देवताओं की उपासना से जुड़ा हो. इन्हीं धार्मिक धरोहरों में से एक है रामगंज बाजार स्थित लाडलीजी मंदिर, जहां राधारानी आठ सखियों के साथ विराजित हैं. ये मंदिर आज भी न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि जयपुर के सांस्कृतिक जीवन का प्रतीक भी है.
जयपुर के रामगंज बाजार स्थित लाडलीजी मंदिर में राधाष्टमी केवल एक दिन का पर्व नहीं, बल्कि राधा अष्टमी से पहले ही यहां तमाम सखियों का जन्मदिन मनाते हुए भक्ति-उत्सव का दौर चलता है. मान्यता के अनुसार राधारानी की आठों सखियों विशाखा, चंपकलता, रंगदेवी, चित्रलेखा, इंदुलेखा, सुदेवी, ललिता और तुंगविद्या का जन्मोत्सव अलग-अलग मनाया जाता है और राधा अष्टमी के दिन बड़े धूमधाम से राधा रानी को बाल स्वरूप मानते हुए उनसे लाड लडाते उनके भोग लगाकर झूला झुलाया जाता है.
वृंदावन से जयपुर तक की यात्रा : आचार्य लवेश कुमार गोस्वामी ने बताते हैं कि इस मंदिर में राधा तत्व प्रधान है. जयपुर बसावट के समय वृंदावन के ललित कुंज स्थित ललित सम्प्रदाय के आचार्य बंशी अलि जी राधारानी को आठ सखियों सहित जयपुर लाए. आचार्य बंशी अलि ने राधारानी को कृष्ण की बंशी का अवतार मानकर वर्षों कठोर तपस्या की. जयपुर के राजा ने उनसे यहां आने का आग्रह किया. ये स्थान उपलब्ध कराया और यहां राधा रानी के मंदिर की स्थापना करवाई. ये राजस्थान का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां राधाजी भगवान कृष्ण और अपनी आठ सखियों के साथ विराजित हैं.
ललित कुंज है सबसे पुराना स्थान : आचार्य लवेश कुमार गोस्वामी ने बताया कि राधा रानी वृंदावन में ललित संप्रदाय के सबसे पुराने स्थान ललित कुंज में विराजित थी. इसके पीछे तप और साधना की कहानी जुड़ी हुई है. आचार्य बंशी अलि ने पहले 6 साल ललित कुंज में तपस्या की तब ललिता जी ने उनको दर्शन दिए. उनसे कहा कि आप बरसाना जाओ वहां तपस्या करो, तब किशोरी जी के दर्शन होंगे. उन्होंने ललिता जी को गुरु बनाया. ललिता जी ने उनको गुरु मंत्र दिया, फिर वो बरसाना गए. वहां उन्होंने 12 वर्ष तपस्या की, तब एक दिन सपने में देखा कि वो तपस्या स्थल से ऊपर मंदिर में आ जाएं, लेकिन जब वो मंदिर गए तो मंदिर के गोस्वामी ने उन्हें मंदिर बंद होने का समय बताते हुए अंदर नहीं जाने दिया. जब बंशी अलि जी नहीं माने तो गोस्वामी ने खड़ाऊ उठाकर उन्हें मारी. इससे वो चोटिल हो गए. तब गोस्वामी जी ने देखा कि एक बंशी अलि चोटिल होकर खड़े हैं और दूसरे किशोरी जी के चरणों में जा रहे हैं.
स्थापत्य कला का अनमोल रत्न : लाडलीजी मंदिर तत्कालीन जयपुरी वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है. गर्भगृह संगमरमर और लाल पत्थर से निर्मित है. नक्काशीदार तोरण द्वार और शिखर मंदिर को विशिष्ट पहचान देते हैं. गर्भगृह की सूक्ष्म नक्काशी और दीवारों की कलाकारी तत्कालीन शिल्पकारों की अद्भुत कला का प्रमाण है. आज लगभग 290 साल बाद भी ये मंदिर ज्यों का त्यों है.
सामाजिक-सांस्कृतिक केंद्र : अपनी बसावट से ही लाडलीजी मंदिर केवल उपासना का स्थल नहीं रहा, बल्कि यहां सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी केंद्र रहा है. झूलनोत्सव, राधाष्टमी और जन्माष्टमी जैसे पर्व आज भी भव्य रूप से मनाए जाते हैं. इन अवसरों पर रामगंज बाजार भक्ति, संगीत, नृत्य और उल्लास से गूंज उठता है. विशेष भजनों और झांकियों में शहरभर के श्रद्धालु और व्यापारी वर्ग की सक्रिय भागीदारी रहती है. यहां नियमित पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की माने तो बरसाने की गलियों की भक्ति रस में डुबो देने वाली अनुभूति इस मंदिर में सहज ही मिल जाती है.
परंपरा आज भी जीवंत : लाडलीजी मंदिर आज भी रामगंज बाजार की पहचान है. सुबह-शाम की नियमित आरती, राग-भजन की परंपरा और विशेष अवसरों पर सजीव झांकियां यहां के धार्मिक जीवन की धड़कन हैं. आधुनिकता की ओर बढ़ते जयपुर में भी नई पीढ़ी का आकर्षण इस मंदिर से कम नहीं हुआ है. कई परिवार पीढ़ियों से यहां आराधना और सेवाभाव से जुड़े हुए हैं. यही वजह है कि ये मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि आस्था, स्थापत्य और संस्कृति का जीवंत संगम है.




















