बाड़मेर. पश्चिम राजस्थान का बाजरा जो कभी गांव की थाली तक सीमित था अब लंदन के मेन्यू में ‘हेल्दी फूड ऑप्शन’ बन गया है. बाड़मेर के छोटे से गांव आदर्श ढूंढा की 10 महिलाओं ने मिलकर बाजरे से बिस्किट बनाए, स्वाद में देसी तड़का लगाया और अब वो बिस्किट लंदन की चाय के साथ सर्व हो रहा है. घूंघट से निकलकर ग्लोबल ब्रांड तक का ये सफर काफी संघर्षों भरा रहा है.
कभी जो महिलाएं घर की चारदीवारी तक सीमित थीं आज उनका हुनर लंदन के बाजारों तक पहुँच गया है. हेमलता और उनकी अन्य साथियों ने मिलकर ‘जीजी बाई स्वयं सहायता समूह’ बनाकर बाजरे से बिस्किट बनाना शुरू किया और अब उनका यह देसी उत्पाद एक इंटरनेशनल ब्रांड बन गया है. इन महिलाओं द्वारा बनाए गए बाजरे के बिस्किट की डिमांड अब विदेशों में भी बढ़ने लगी है.
16 मई 2024 को इन महिलाओं ने शुरू किया काम
16 मई 2024 को ढूंढा गांव की हेमलता, धूड़ी, पुष्पा, प्रिया, लक्ष्मी, मीरा, कमला, सुशीला, संगीता और निरमा ने मिलकर बाजरे के कुकीज बनाना शुरू किया ताकि घर के कामकाज के साथ साथ कमाई भी हो जाए और पहचान भी मिल जाए. रेगिस्तान के खेतों में बहुतायत में होने वाला बाजरा को आधुनिक प्रोसेसिंग कर उसके बिस्किट बनाया. इन महिलाओं ने स्वाद और सेहत का ऐसा मेल बनाया कि इनके बनाए गए बाजरा बिस्किट की मांग सिर्फ बाड़मेर तक नहीं रुकी बल्कि लंदन के सुपरमार्केट तक पहुंच गई है.
एक साल में 4 लाख रुपये टर्न ओवर
इन महिलाओं को केयर्न वेदांता ने पूरी मशीनरी और वह मुकाम हासिल करवाया जहां पर बाजरे के बने कुकीज को बेच सकती हैं. महज एक साल के भीतर ही इस स्वयं सहायता समूह ने 3-4 लाख रुपये का टर्नओवर कर दिखाया है. महिलाएं बिस्किट बनाने से लेकर उसकी पैकेजिंग तक का काम खुद करती हैं. बिस्किट की शुद्धता और देसी स्वाद ने ग्राहकों का दिल जीत लिया है.
1 हजार रुपये प्रति किलो के हिसाब से होती है ब्रिकी
बिस्किट बनाने वाली हेमलता नामा के मुताबिक पहले हम बस खाना बनाना, बर्तन धोना और बच्चों को संभालना ही जानते थे लेकिन अब घर के साथ-साथ खुद का व्यवसाय भी संभाल रहे हैं. इसे वह बाजार में 1000 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच रही हैं. वह बताती हैं कि अब हम सिर्फ घर नहीं दुनिया संभाल रहे हैं. वहीं ब्रिगेडियर बीएस शेखावत के मुताबिक जीजी बाई स्वयं सहायता समूह के बाजरे के बिस्किट की काफी डिमांड रहती है.




















