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बाघों का पसंदीदा ठिकाना बना बूंदी का RVTR, रणथंभौर से खुद चलकर आया था ‘मुखिया’

बूंदी : बाघों के लिए सुरक्षित और प्राकृतिक रूप से समृद्ध बूंदी का रामगढ़ टाइगर रिजर्व आज पूरे देश में अपनी विशेष पहचान बना चुका है. बाघों के लिए ‘मेटरनिटी होम’ के रूप में चर्चित यह इलाका राजस्थान के चौथे और देश के 52वें टाइगर रिजर्व के रूप में स्थापित हो चुका है. रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व की खूबी यह है कि इसका प्राकृतिक भूगोल और हरियाली बाघों को स्वाभाविक रूप से आकर्षित करती है. यही वजह है कि यहां का मुखिया (RVT- 1) खुद रणथंभौर से चलकर यहां निवास के लिए पहुंचा. अब यह क्षेत्र बाघों के नए कुनबे के बसने की दिशा में लगातार बढ़ रहा है.

पूरा रामगढ़ टाइगर (RVT- 1) की टेरिटरी बन गया है, जिसे रामगढ़ का मुखिया के नाम से पुकारा जाने लगा है. इसके साथ ही कोटा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से लाया गया बाघ (RVT- 7) पर वन्यजीव प्रेमियों की काफी उम्मीदें टिकी हैं. वर्तमान में टाइगर रिजर्व में 4 टाइग्रेस मौजूद हैं, जिनमें दो युवा बाघिन रामगढ़ टाइगर रिजर्व के मुखिया (RVT- 1) की पुत्रियां हैं. एक शावक नर बाघ भी 9 माह का हो चुका है.

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रामगढ़ कोर एरिया में जंगल सफारी की मंजूरी की जरूरत : पर्यटन प्रकोष्ठ से जुड़े भंवर सिंह ने बताया कि रामगढ़ टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में जंगल सफारी की शुरुआत की अनुमति लंबे समय से लंबित है. टाइगर कंजर्वेशन प्लान (TCP) को एनटीसीए (नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी), दिल्ली को भेजे हुए काफी समय बीत चुका है, लेकिन अब तक उसकी स्वीकृति नहीं मिली है. रामगढ़ जैसे प्राकृतिक और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र में पर्यटन की भारी संभावनाएं हैं. जंगल सफारी शुरू होने से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और क्षेत्रीय पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा. टाइगर कंजर्वेशन प्लान को तत्काल मंजूरी दिलवाकर जंगल सफारी प्रारंभ की जाए.

रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बहुत अधिक हो गई है, जिससे वहां मानव-बाघ संघर्ष के मामले बढ़ते जा रहे हैं. सीमित क्षेत्रफल के चलते कई बाघ आपस में संघर्ष कर रहे हैं या मानव आबादी की ओर बढ़ रहे हैं. समाधान के तौर पर कम से कम 9 बाघ-बाघिनों को रामगढ़ टाइगर रिजर्व में रिलोकेट किया जाए. रामगढ़ में पर्याप्त वन क्षेत्र और शांत वातावरण उपलब्ध है, जो बाघों के लिए अनुकूल है. बाघों के भोजन के लिए लगभग 1200 सांभर व चीतल को अन्य संरक्षित जंगलों से रामगढ़ अभयारण्य में लाया जाए, कोर एरिया के गांव रीलोकेट हों और युवाओं को गाइड ट्रेनिंग मिले. रामगढ़ टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में करीब आठ गांव मौजूद हैं, जो बाघों के मूवमेंट में बाधा बन रहे हैं. इन गांवों का तत्काल पुनर्वास (रीलोकेशन) किया जाना आवश्यक है, ताकि बाघों को सुरक्षित और खुला क्षेत्र मिल सके. यह कदम वन्यजीव संरक्षण और सामाजिक विकास दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होगा.

इतिहास और विस्तार : रामगढ़ क्षेत्र को 1982 में ‘रामगढ़ विषधारी वन्यजीव अभयारण्य’ के रूप में अधिसूचित किया गया. इसके बाद 2022 में इसे टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला. यह रिजर्व कुल 1501.89 वर्ग किलोमीटर (150189.21 हेक्टेयर) क्षेत्र में फैला हुआ है, जो कोटा के मुकुंदरा टाइगर रिजर्व से भी बड़ा है. रामगढ़ को सदियों से शिकारगाह और बाघों के प्राकृतिक वास स्थल के रूप में जाना जाता रहा है. इसकी घनी घाटियां, जलस्रोत और सघन वन संरचना इसे आदर्श टाइगर हेबिटेट बनाते हैं.

प्राकृतिक धरोहर और जैव विविधता : रामगढ़ टाइगर रिजर्व में इस समय 7 बाघ-बाघिन का स्थायी निवास है. इसके अलावा यहां पैंथर, भालू, लोमड़ी, सियार, बघेरा, जंगली बिल्ली, कबर बिज्जू, सीवेट, नेवला, सेही, सांभर, चीतल, नीलगाय जैसे कई वन्यजीव सहज रूप से देखे जा सकते हैं. यहां की जल संरचनाएं और वाटर पॉइंट न केवल जानवरों के लिए जीवन रेखा हैं, बल्कि हर साल हजारों किलोमीटर दूर से आने वाले प्रवासी पक्षियों का भी बसेरा बनते हैं. मोर की संख्या भी इस क्षेत्र में अच्छी-खासी है. रामगढ़ की एक ओर रणथंभौर टाइगर रिजर्व है और दूसरी ओर मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व, जिससे यह एक अहम कड़ी की तरह कार्य करता है. तीनों रिजर्व मिलकर राजस्थान में टाइगर कॉरिडोर का एक मजबूत ढांचा तैयार करते हैं. रामगढ़ का भूगोल विशेष रूप से बाघों के प्रजनन (ब्रीडिंग) के लिए उपयुक्त माना जाता है. इसकी हरियाली और खुली ग्रासलैंड क्षेत्र इसे रणथंभौर से भी अधिक प्रजनन अनुकूल बनाते हैं.
बाघों का जच्चा घर- रामगढ़ : पूर्व वन्यजीव प्रतिपालक विठ्ठल सनाढ्य बताते हैं रामगढ़ को ‘बाघों का जच्चा घर’ कहते हैं. ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुराने वन विभागीय अभिलेखों में भी यहां लंबे समय तक बाघिनों के बच्चों को जन्म देने के प्रमाण दर्ज हैं. इस परंपरा को अब सरकारी दर्जा मिल चुका है. रामगढ़ विषधारी रिजर्व को भविष्य में रणथंभौर का बफर नहीं, बल्कि स्वतंत्र बाघ संरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है. यहां बाघों का प्राकृतिक पुनर्वास एक बड़ी उपलब्धि है.

दी महोत्सव की घोषणाएं बनी केवल औपचारिकता : 20 नवंबर 2024 को बूंदी महोत्सव के दौरान जैत सागर झील में देसी-विदेशी पर्यटकों के लिए बोटिंग की शुरुआत की गई थी. तय किराए के साथ शुरू हुई बोटिंग ने शुरुआत में कुछ उम्मीदें जगाईं, लेकिन कुछ ही दिनों में यह पहल दम तोड़ गई. न तो संचालन की कोई नियमित व्यवस्था बन सकी और न ही रखरखाव पर ध्यान दिया गया. वहीं, रामगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में जंगल सफारी को लेकर की गई घोषणाएं भी धरातल पर नहीं उतर पाईं. बूंदी महोत्सव के अवसर पर जिला प्रशासन ने 15 किलोमीटर के जंगल सफारी रूट की शुरुआत की थी. जिला कलेक्टर स्वयं इस रूट पर सफारी का अनुभव भी ले चुके हैं, लेकिन कोर एरिया तक सफारी को विस्तार देने के लंबे समय से चल रहे प्रयास एनजीटीसीए (नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी) की मंजूरी के अभाव में अधूरे ही हैं. पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि रामगढ़ को टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने के बावजूद वहां पर्यटन गतिविधियों का स्थायित्व नहीं बन पा रहा है, जिससे स्थानीय पर्यटन उद्योग और रोजगार की संभावनाओं को भी नुकसान हो रहा है.

गांवों की विस्थापन प्रक्रिया : रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में बाघों के सुरक्षित आवास और मानव-बाघ संघर्ष को रोकने के लिए गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया तेज़ी से चल रही है. इस कार्य के अंतर्गत गांववासियों को दो विकल्प दिए जा रहे हैं, जिसमें कैश पैकेज या लैंड पैकेज (जमीन के बदले जमीन) शामिल है. टाइगर रिजर्व के डीएफओ अरविंद झा ने बताया कि गुलखेड़ी गांव में 175 परिवारों ने कैश पैकेज स्वीकार कर लिया है, जिससे वे स्वेच्छा से क्षेत्र से बाहर चले गए हैं. केवल 20 से 30 परिवार ही ऐसे हैं जो लैंड पैकेज का इंतजार कर रहे हैं. इनके लिए केसरपुरा क्षेत्र में जमीन अलॉटमेंट की प्रक्रिया अंतिम चरण में है और जल्द ही इन परिवारों को वहां बसाया जाएगा.

अब इन गांवों की बारी : डीएफओ झा ने बताया कि अब विस्थापन की अगली प्रक्रिया भेरूपुरा, भीमगंज और काशीपुरा गांवों में शुरू हो रही है. यहां सर्वे कार्य जारी है और आगामी महीनों में इन गांवों को भी टाइगर रिजर्व क्षेत्र से बाहर स्थानांतरित किया जाएगा. विस्थापन प्रक्रिया में देखा गया है कि अधिकतर ग्रामीण कैश पैकेज को प्राथमिकता दे रहे हैं. उन्हें अपनी ज़मीन और घर के बदले एकमुश्त मुआवजा दिया जा रहा है, जिससे वे अपनी सुविधानुसार कहीं और बस सकते हैं. कैश पैकेज में 15 लाख तक की राशि प्रति परिवार (नीति के अनुसार) दी जा रही है. वहीं, लैंड पैकेज में जमीन के बदले जमीन व घर निर्माण सहायता मिल रही है.

रामगढ़ टाइगर फाउंडेशन अध्यक्ष त्रिभुवन सिंह हाड़ा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस हर साल 29 जुलाई को दुनिया भर में मनाया जाता है. इसका मकसद केवल बाघों का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि उनकी घटती संख्या और विलुप्ति के खतरे को लेकर समाज में जागरूकता फैलाना है. इस वर्ष बाघों के संरक्षण के लिए शुरू किए गए ‘टाइगर प्रोजेक्ट’ को 50 साल पूरे हो रहे हैं. बीते 150 वर्षों में बाघों की आबादी में लगभग 95 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है. भारत में 2018 में बाघों की संख्या जहां 2900 से अधिक थी. वहीं, वर्ष 2023 में यह बढ़कर 3167 हो गई है, जो संरक्षण प्रयासों की सफलता का संकेत है. हाड़ा ने आमजन से अपील की है कि वे बाघों के आवासों की रक्षा करें, जंगलों को संरक्षित रखें और वन्यजीवों के संरक्षण में सहभागी बनें.

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