राजस्थान के रेगिस्तान की सुनहरी रेत में बसी सवर्ण नगरी ना केवल अपने किलों और रंग-बिरंगे लोकगीतों के लिए मशहूर है बल्कि यहां की हवेलियों की बात हो और पटवों की हवेली का जिक्र ना हो, ऐसा मुमकिन नहीं है. करीब 300 साल पुरानी यह हवेली एक नहीं बल्कि पांच अलग-अलग भागों में बनी एक विशाल हवेली समूह है. इसे जैसलमेर के रईस व्यापारी गुमानचंद पटवा और उनके परिवार ने बनवाया था.
गोल्डन सिटी के नाम से मशहूर जैसलमेर राजस्थान के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक है. जैसलमेर अपने ऐतिहासिक किलों, रेगिस्तानी रोमांच और आर्किटेक्चर की वजह से दुनियाभर में मशहूर है. इन्हीं में से एक है पटवों की हवेली. यह हवेली अपनी भव्यता, नक्काशी और इतिहास के लिए जानी जाती है.
पटवों की हवेली की दीवारों पर बारीक नक्काशी की गई है. जिसमें फूल-पत्तियों, जानवरों और पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं. इसके झरोखे और मेहराबदार दरवाजे राजस्थानी शिल्पकला का बेहतरीन नमूना है. हवेली के एक हिस्से को म्यूजियम में बदल दिया गया है, जहां 19वीं शताब्दी के पुराने सिक्के, कपड़े, पेंटिंग्स और घरेलू सामान को रखा गया है.
पटवों की हवेली का निर्माण 19वीं शताब्दी में पटवा बंधुओं के नाम से जाने जाने वाले एक धनी जैन व्यापारी परिवार द्वारा किया गया था. पटवा प्रमुख व्यापारी थे जो सोने, चांदी और कीमती पत्थरों का व्यापार करते थे. हवेली परिसर में पांच अलग-अलग हवेलियां हैं. पटवों की हवेली का निर्माण लगभग 50 सालों में पूरा हुआ था.
इस हवेली की सबसे खास बात यह है कि इसे बिना सीमेंट और लोहे के बनाया गया है. पीले बलुआ पत्थर की इतनी बारीक नक्काशी की गई है कि हर दीवार, हर झरोखा खुद बोलता नजर आता है. हवेली के हर हिस्से में उस दौर की वास्तुकला, सांस्कृतिक समझ और बेशुमार रईसी की झलक मिलती है.
पटवों की हवेली में घूमने के लिए सुबह 9 बजे से लेकर शाम 6 बजे के बीच कभी भी जा सकते हैं. पटवों की हवेली में प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति से लगभग 20 रुपया लिया जाता है और अगर आप कैमरा लेकर जाना चाहते हैं तो उसका चार्ज अलग से व्यय करना पड़ेगा. इस हवेली के आस-पास मौजूद होटल में आप पारंपरिक भोजन में दाल बाटी चूरमा, मसाला रायता सहित अन्य देशी जायके का लुत्फ़ उठा सकते हैं.




















