जयपुर. राजधानी जयपुर अपने ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिरों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. खासतौर पर यहां की चारदीवारी के भीतर स्थित राजा-महाराजाओं द्वारा बनवाए गए कई भव्य मंदिर अद्भुत वास्तुकला और आध्यात्मिकता के केंद्र हैं.जयपुर के छोटी चौपड़ के पास स्थित सिरह ड्योढ़ी बाजार का श्री रामचंद्रजी मंदिर ऐसा ही एक मंदिर है, जिसका निर्माण लगभग 180 वर्ष पूर्व करवाया गया था. इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि देश का यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसका नाम भले ही ‘श्री रामचंद्रजी मंदिर’ है और भक्त यहां भगवान राम के दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित है. इसके पीछे एक ऐतिहासिक और रोचक कथा जुड़ी है, जो भक्तों को आश्चर्यचकित कर देती है.
यह मंदिर वैष्णव संप्रदाय से जुड़ा हुआ है. जयपुर का यह इकलौता ऐसा मंदिर है जिसका प्रांगण सबसे बड़ा और अत्यंत भव्य माना जाता है. इसकी वास्तुकला इस बात का प्रमाण देती है कि इस मंदिर को पूरी तरह बनने में लगभग 15 वर्षों का समय लगा होगा. मंदिर की एक विशेष बात यह भी है कि यह पूरी तरह से बाजारों से घिरा हुआ है. चारों ओर बाजार का शोरगुल रहता है, लेकिन मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते ही एक अद्भुत शांति की अनुभूति होती है. मानो मंदिर किसी वीरान शांत स्थान पर स्थित हो.मंदिर आज भी अपने प्राचीन स्वरूप में संरक्षित है, जिससे न केवल स्थानीय लोग, बल्कि जयपुर आने वाले पर्यटक भी यहां दर्शन करने विशेष रूप से पहुंचते हैं. वास्तु, इतिहास और आध्यात्मिकता का यह अद्वितीय संगम जयपुर की सांस्कृतिक धरोहर को और अधिक समृद्ध बनाता है.
1840 से 1855 के मध्य बना था यह अनोखा मंदिर
आपको बता दें कि सिरहड्योढ़ी बाजार का श्री रामचंद्रजी मंदिर का निर्माण जयपुर महाराजा सवाई रामसिंह की महारानी चन्द्रावती जी द्वारा सन् 1840 से 1855 के मध्य में करवाया गया था. सबसे पहले मंदिर का नामकरण राम चन्द्रावती मंदिर था, जिसमें मंदिर के नाम के लिए इसमें राम शब्द का उपयोग महाराजा रामसिंह के नाम से और चन्द्रवती रानी के नाम से लिया गया. तब जाकर इस मंदिर का नामकरण हुआ, लेकिन कुछ वर्षों बाद मंदिर का नाम चन्द्रावती मंदिर से बदलकर श्री रामचन्द्र मंदिर हो गया. मंदिर के पुजारियों के अनुसार महारानी श्री कृष्णजी की अनन्य भक्त थीं, इसलिए मंदिर में सबसे पहले स्थापना के लिए भगवान श्री कृष्ण का बड़ा विग्रह तैयार करवाया गया था. लेकिन मूर्ति स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा के समय महारानी चंद्रावती का स्वर्गवास हो जाने के कारण मूल विग्रह की स्थापना अशुभ मानी गई, इसलिए बाद में चन्द्रावती की निज सेवा की धातु की छोटी मूर्तियों को मंदिर में विराजमान करवाया गया, जो आज भी मंदिर में विराजमान है.
आपको बता दें कि जयपुर के प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला से ही उनकी खास पहचान है. ऐसे ही रामचंद्र जी का यह मंदिर भी भव्य वास्तुकला का नमूना पेश करता है. मंदिर का भव्य भवन एक एकड़ क्षेत्रफल जो अन्य मंदिरों से बड़ा है. वहीं मंदिर के भवन में कुल 9 अलग-अलग चौक बने हैं. इसके अलावा मंदिर दो मंजिला महल के रूप में बना है, जो बेहद ही सुंदर है. मंदिर भवन का अग्रभाग जाली और झरोखो से युक्त जयपुर स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है. मंदिर में प्रवेश स्थल पर बने सिंहद्वार से लेकर गर्भगृह आदि स्थापत्य की दृष्टि से अति उत्कृष्ट तथा दर्शनीय है. आपको बता दें कि यह मंदिर देवस्थान विभाग के अधीन है, और 1997 से दिव्य ज्योति संस्थान को सुपुर्दगी पर दिया हुआ है.




















